Monday, 4 November 2024

मोहन नागर परिचय

नाम- मोहन नागर
पिता- स्व. श्री भँवरलाल लाल नागर
जन्मतिथि- 23-02-1968
शिक्षा- एम. ए. पोलिटिकल साइंस
व्यवसाय- कृषि
मूलतः राजगढ़ जिला के ग्राम रायपुरिया (तहसील, पचोर) निवासी स्वयंसेवक ।
संघ शिक्षा वर्ग तृतीय वर्ष शिक्षित, 12 वर्ष तक उज्जैन व नर्मदापुर विभाग में नगर, तहसील व जिला प्रचारक ।
- 1998 से विद्या भारती पूर्णकालिक
वर्तमान दायित्व- सचिव भारत भारती शिक्षा संस्थान, बैतूल व क्षेत्र संयोजक, विद्या भारती जनजाति क्षेत्र की शिक्षा मध्यक्षेत्र
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अन्य गतिविधि
- नदी व जल संरक्षण के क्षेत्र में कार्य करने के कारण भारत सरकार के जलशक्ति मंत्रालय द्वारा 2019 राष्ट्रीय "जल प्रहरी" सम्मान से जल शक्ति मन्त्री जी द्वारा दिल्ली में सम्मानित ।
- जल संरक्षण के ही क्षेत्र में जल शक्ति मंत्रालय द्वारा 2020 में "वाटर हीरो" सम्मान से सम्मानित ।
- मध्यप्रदेश सरकार के द्वारा गौ सेवा हेतु दिया जाने वाला  "गोपाल पुरस्कार" से सम्मानित ।
- मध्यप्रदेश शासन की साहित्य अकादमी द्वारा स्वयं की काव्य कृति "चातुर्मास" को दुष्यंत कुमार साहित्य अकादमी पुरस्कार से महामहिम राज्यपाल द्वारा सम्मानित ।
- माध्यमिक शिक्षा मण्डल मध्यप्रदेश बोर्ड में दो बार सदस्य,
- मध्यप्रदेश पाठ्यपुस्तक निगम व राज्य ओपन स्कूल सदस्य ( पूर्व)
- मध्यप्रदेश जन अभियान परिषद जिला बैतूल के दो कार्यकाल उपाध्यक्ष ।
- वर्तमान में राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 टास्क फोर्स मध्यप्रदेश सदस्य ।
- वर्तमान में नानाजी देशमुख पशु चिकित्सा यूनिवर्सिटी जबलपुर प्रबन्धन मण्डल सदस्य ।
रुचि- ग्राम स्वावलम्बन,
जैविक कृषि, जल संरक्षण ।
सम्पर्क- mob. 9754811555
9425003189
मेल- mohanbharatbharati@gmail.com

Tuesday, 10 October 2017

#आदर्श_ग्राम

#आदर्श_ग्राम 
दो वर्ष पूर्व विद्या भारती जनजाति शिक्षा के आदर्श ग्राम बाचा के ग्रामवासियों से मिलने संघ के क्षेत्र प्रचारक आदरणीय अरुण जी जैन आये थे | तब ग्राम भ्रमण के समय उन्होंने आंवला का एक पौधा भी रोपा था |
आज पुनः बाचा जाना हुआ तो मैंने उस पौधे के बारे में पूछताछ की | कार्यकर्ता मुझे तुरन्त उस स्थान पर ले गए | सुखद अनुभूति हुई कि वह नन्हा पौधा पेड़ का आकार लेता जा रहा है |
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विद्या भारती की जनजाति शिक्षा द्वारा २००९ में इस गाँव में एकल विद्यालय प्रारम्भ हुआ था | एक छोटा सा दीपक के प्रकाश से आज पूरा गाँव प्रकाशवान है |
- तब से अब तक गाँव का कोई भी विवाद थाने में नहीं पहुँचा | गाँव में १५-२० युवकों की टीम बनी | उसने गाँव का परिदृश्य बदल दिया |
हर वर्ष जल संरक्षण के लिए पूरा गाँव #जल_महोत्सव मनाता है | गाँव के -
- अधिकांश लोग बोरी बाँध मे श्रमदान करते हैं | (इस वर्ष गाँव का जल महोत्सव अगले शनिवार १४ अक्टूबर को है)
- सप्ताह में एक दिन पूरा गाँव ग्राम स्वच्छता करता है | कुओं और हेंडपम्प की भी नियमित सफाई होती है |
- घर-घर अन्नपूर्णा मंडपम सजने लगे ( घर से निकले अपशिष्ट जल से सब्जी-भाजी की खेती)
- पूरे उत्सव मिलकर मनाते हैं | वहाँ का जन्माष्टमी उत्सव देखने आसपास के गाँव से लोग देखने आते है |
- अभी अन्तराष्ट्रीय वृद्धजन दिवस पर युवाओं ने ग्राम की वृद्ध माताओं को साड़ी पहनाकर सम्मान किया |
- जागरूकता आने से शासन की योजनाओं का लाभ भी गाँव को मिलने लगा | २००९ में केवल एक शौचालय था, आज हर घर में शोचालय है और लोग उसका उपयोग भी करते हैं |
- ग्राम के सरपंच राजेन्द्र कवडे जी ने बताया कि सिंचाई की व्यवस्था और शासन की अन्य योजनाओं के कारण जो गाँव दीपावली के बाद रोजगार की तलाश में लगभग पूरा ही पलायन कर जाता था, आज कोई रोजगार की तलाश में बाहर नहीं जाता | महिलाओं के छः स्व सहायता अल्प बचत समूह हैं |
- गाँव में अभी भी पूरी खेती बैलों से होती है, कुछ किसान पूर्णतः जैविक कृषि करने लगे है |
- गाँव के छोटे से हनुमान मन्दिर में प्रतिदिन आरती होती है | और आरती की थाली हर दिन अलग-अलग घर से जाती है |
- गाँव के युवा गाँव में व्याप्त कुछ अन्य बुराइयों को दूर करने के लिए उपाय सोचते रहते हैं |
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ग्राम पंचायत को इस बार "स्वच्छता ही सेवा" के अंतर्गत घोडाडोंगरी विकासखण्ड की स्वच्छ पंचायत का पुरूस्कार अभी २ अक्टूबर को मिला है | सरपंच साहब बोले "यह पुरूस्कार विद्या भारती के एकल विद्यालय के छोटे-छोटे बच्चों के कारण ही मिला है | इसी के कारण हमारे गाँव में परिवर्तन आया है " |

#CrackerBan

#CrackerBan
हिन्दू जाति तो वैसे ही #सहिष्णु है #माननीय | वो पटाखे तो क्या, इस जाति में कुछ तो ऐसे #सेकुलर है जो आप नारियल फोड़ने पर भी प्रतिबन्ध लगायेंगे तो भी आपका आदेश मान लेगी |
लैकिन हमारी आपसे कुछ विनती है #मी_लॉड कि आप .....
- उन पटाखों पर भी प्रतिबन्ध लगाओ जो पाकिस्तान के जीतने पर हिन्दुस्थान में फोड़े जाते हैं |
- उन पटाखों को भी फूटने से रोको जो एक विदेशी त्यौहार ३१ दिसम्बर की आधी रात को फोड़े जाते हैं, जिससे छोटे-छोटे बच्चों और वृद्धों की नींद खराब होती है |
- उन पटाखों का संज्ञान लीजीये #सर्वोच्च_न्यायालय जो छत्तीसगढ़ में नक्सली हमले में हमारे जवानों के शहीद होने पर आपकी नाक के नीचे #जेएनयू में फोड़े जाते हैं |
- उन पटाखों पर प्रतिबन्ध का आदेश दीजीये माननीय जो #चाइना से हमारे देश में आकर देश की अर्थव्यवस्था को कमजोर कर रहे हैं |
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दीपावली के पटाखों से फैला प्रदूषण तो कुछ दिनों में खत्म हो जायेगा पर राष्ट्रद्रोह का यह जहरीला धुआँ देश की हर व्यवस्था में नासूर बनता जा रहा है | इसको रोकने में देश की कार्यपालिका और विधायिका का साथ दीजीये न्यायपालिका के न्यायप्रियों !
देशज पर्वों पर दायर याचिकाओं के पीछे की धूर्त मंशा समझिए माननीय ! वरना कल से कोई याचिका लगा देगा कि अश्रु गैस का धुआँ सबसे जहरीला होता है, इस पर प्रतिबन्ध लगना चाहिए और आप लगा भी देंगे |

Sunday, 1 October 2017

पानी रोको अभियान

#पानी_रोको_अभियान के तहत आज बैतूल जिले के सभी दस विकासखंडों में वर्षा जल को रोकने के लिए आयोजित कार्यशालाएं सम्पन्न हुई | आमला, बैतूल, घोड़ाडोंगरी, शाहपुर, चिचोली, भीमपुर, मुलताई, प्रभातपट्टन, भैंसदेही और आठनेर जनपद मुख्यालयों पर आयोजित इन कार्यशालाओं में जिला पंचायत, जनपद पंचायत के अधिकारी, निर्वाचित प्रतिनिधि, उप यंत्री, सम्बंधित नगरपालिकाओं के सीएमओ के साथ सभी ग्राम पंचायतों के सरपंच, सचिव, रोजगार सहायक, जन अभियान परिषद के समन्वयक, मेंटर्स, विद्या भारती जनजाति शिक्षा के कार्यकर्ताओं के साथ स्वयंसेवी संगठनों के प्रतिनधि आदि मिलाकर तीन हजार से अधिक प्रशिक्षार्थियों ने इस महाभियान में भागीदारी की |
कार्यशालाओं में गाँव के नदी, तालाब, कुओं और अन्य जलस्रोतों का रखरखाव, स्टाप डेम, पटिया डेम में समय से कड़ी शटर लगाकर बन्द करना तथा बोरी बंधान का प्रशिक्षण दिया गया | इसमें अधिक बातें पावर पाइंट के माध्यम से बताई | इसके अतिरिक्त वर्षा जल को रोकने के लिए अपने घरों में सोंखता गड्डा बनाना, खेतों में मेढ़ बंधान, खन्ती खोदना, पहाड़ों पर पानी रोकना तथा पौधारोपण की भी तकनीकियाँ सिखाई | परस्पर संवाद के माध्यम से प्रशिक्षणार्थियों के प्रश्न और सुझावों पर भी सभी जगह विस्तार से चर्चा हुई |
ईश्वर की कृपा कुछ ऐसी रही कि जिस दिन से प्रशिक्षण प्रारम्भ हुए उसी दिन से जिले मे वर्षा भे होने लगी | जैसे ही वर्षा जल का बहाव नदी-नालों में कम होगा | पूरे जिले में बोरी बंधान बनाने का काम एक महाभियान और महोत्सव के रूप में होगा और इस वर्ष अल्प वर्षा से उत्पन्न हुई स्थिति का सामना जिले के लोग कर सकेंगे |
#जलं_रक्षति_रक्षितः (हम जल की रक्षा करें, जल हमारी रक्षा करेगा)






विजयादशमी सन्देश

#विजयादशमी संदेश ।
हर युग मे रावणीय प्रवृत्तियाँ जन्म लेती है और उनका विनाश होता है ।
-मोहन नागर
रावण एक दुष्प्रवृत्ति का नाम है । रावण अहंकार है । रावण आतंक का नाम है । रावण छल है कपट है । रावण का जीवन चरित्र पढ़ेंगे तो ध्यान में आएगा कि रावण काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर और हिंसा है । इतने दुर्गुणों से युक्त व्यक्ति अगर परम ज्ञानी और विद्वान हो तो वह अपने ज्ञान और विद्वत्ता का उपयोग किसके लिए करेगा । स्वाभाविक है अपने स्वार्थ के लिए । इसके लिए अगर उसे किसी का अहित करना पड़े तो करेगा ।
रावण ने यही तो किया । दुनियाँ की सारी संपत्ति लूटकर अपने घर को सोने का बना लिया ।
रामायण में रावण के वध होने पर रावण की पत्नी मन्दोदरी विलाप करते हुए कहती है, "अनेक यज्ञों का विलोप करने वाले, धर्म व्यवस्थाओं को तोड़ने वाले, देव-असुर और मनुष्यों की कन्याओं का जहाँ तहाँ से हरण करने वाले! आज तू अपने इन पाप कर्मों के कारण ही वध को प्राप्त हुआ है।"
इसलिए रावण को प्रतीक माना गया अधर्म, अन्याय, अहंकार और अनीति का ।
शास्त्रों में वर्णित है कि रावण अद्भुत विद्वान था और सभी शास्त्रों का ज्ञाता भी। वह महान ऋषि #पुलत्स्य का पौत्र और #विश्वश्रवा का पुत्र था। फिर अधर्म का प्रतीक क्यों माना गया? क्योंकि वह अमर्यादित और अहंकारी था। सत्ता के दंभ में चूर विधान से ऊपर था। #अलोकतांत्रिक था, इसलिए अधर्मी माना गया । और इसी कारण अत्यन्त बलशाली होने के बाद भी रावण मारा गया । एक साधारण वनवासी राम और उनकी सामान्य किन्तु संगठित सेना के हाथों अपने ही गढ़ में रावण परास्त हुआ । तभी हजारों हजार वर्ष से समाज ने राम-रावण युद्ध को याद रखा और उस स्मृति में अन्याय और बुराई के प्रतीक के रूप में रावण के पुतले का दहन होता आ रहा है । ताकि अन्याय और अहंकार का अंत मे क्या हश्र होता है, ये नई पीढ़ी याद रखे । हर युग मे रावणीय प्रवृत्तियां जन्म लेती है और अंततः उसका विनाश हो जाता है ।
आज पुनः हमारे देश मे रावण प्रवृत्ति के लोग समाज मे आकार ले रहे है । आतंकवाद, #अलगाववाद, नक्सलवाद, मतान्तरण, माओवाद, भ्रष्टाचार, जैसी राक्षसी रावणी प्रवृत्तियाँ मुँह बायें खड़ी है । #समाजतोड़क शक्तियाँ रावण के मामा मारीच का मायावी रूप धरकर आज के समाज को छल कपट द्वारा अपने मोहपाश में जकड़ने का षड्यंत्र कर रही है । #रावणीयमानसिकता से युक्त खरदूषण, त्रिसिरा, सूर्पनखा आज भी समाज को छिन्न-भिन्न करने के लिए मायावी रूप धरकर समाज को बरगलाने का काम कर रही है ।
आइये हम भी संगठित समाज (संघे शक्ति कलियुगे) का रूप धारणकर प्रभु श्रीराम का स्मरण कर इन रावणीय दुष्प्रवृत्तियों को परास्त करने का संकल्प लें और उसमें सिद्धि प्राप्त करें ।
#विजय_पर्व की बधाईयाँ-शुभकामनाएं ।

छद्म सेकुलर सोच

#सोचिये
दशहरा आया नहीं कि रावण के गुणगान शुरू ।
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#दीपावली के बीस दिन पहले ही ये मारे #प्रदूषण के खांसने लगेंगे ।
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जब भी कोई हिन्दू त्यौहार आता है तो ये धूर्त #लालगुलाम मानसिकता के लोग इन पर्वों से सम्बन्धित #मनगढ़ंत मिथक बनाकर सोशल मीडिया के बाजार में फर्जी आईडी से चेंप देते हैं ।
और फिर सोशल मीडिया में भोले-भाले नवे-नवेले आये अति उत्साही या लिबरल टाइप के फेसबुकिये उसे शेयर और कॉपी-पेस्ट शुरू कर देते हैं ।
जैसे>>>>>>>
- रावण ने #सूर्पनखा की नाक कटने पर पूरी लंका दाव पर लगा दी, बोलो बहिनों आपको रावण जैसा भाई चाहिए कि नहीं ?
और मूर्ख सेकुलर फेसबुकिये, मर्यादा पुरुषोत्तम राम की बजाय अमर्यादित अहंकारी रावण का गुणगान शुरू कर देते हैं ।
- रावण का पुतला कहता है "क्या मेरे बाद किसी ने बुरा काम नहीं किया समाज में, तो फिर मुझे ही क्यों जलाते हो ?
आज समाज मे सैंकड़ों रावण घूम रहे हैं, उन्हें भी जलाओ । और मुझे जलाने के लिए ये नकली राम नहीं, असली राम हो तो लाओ ।
- माँ दुर्गा को छप्पन भोग क्यों लगाते हो, बाहर भिखारी बैठा है, उसे खिलाओ, माँ प्रसन्न हो जाएगी ।
- एक तरफ शिव प्रतिमा पर दूध चढ़ाते हुए तथा एक फोटो में युगांडा के कुपोषित बच्चे का फोटो डालते हुए लिखते हैं कि ये दूध की जरूरत किसे है । सोचिये ।
- रक्षाबन्धन पर ये धूर्त चुटकुले लिखते हैं कि "यार आज तो घर से बाहर नहीं निकलूँगा, पता नहीं कौन राखी बांध दे ?
-दीपावली पर पटाखों की आवाजें और प्रदूषण ये यंत्रों से नापकर बताते हैं और 31 दिसम्बर पर इनके यंत्र खराब हो जाते हैं ।
- होली के समय होलिका दहन इन्हें एक अबला महिला को जिंदा जलाने की कुप्रथा लगती है ।
- बाकी गणेश स्थापना , देवी पूजा पर भी ये अनास्था पूर्ण टिप्पणियाँ लिखते हैं और #मूर्ख_सेकुलर उसे शेयर करते हैं ।
इसमे गौर करने लायक बात ये है कि #धूर्त_वामपंथी इस तरह के मिथक सिर्फ हिन्दू त्यौहारों पर ही बनाते हैं । अन्य मतावलंबियों के उत्सवों पर ये सात दिन पहले से "मुबारकवाद" शुरू कर देते हैं । हजारों-लाखों पशुओं की हत्या पर इनके मुँह में दहीं जम जाता है ।
20 दिसम्बर से ही ये खुद के बच्चे को सांताक्लाज बनाना शुरू कर देते हैं । और 31 दिसम्बर के पटाखों की आवाज इन्हें शायद शास्त्रीय संगीत के रूप में स्वरान्तर होकर सुनाई देती है ।
कुल मिलाकर आप देखेंगे कि केवल और केवल हिन्दू पर्व को ही ये मजाक ढकोसला सिद्ध करने का षड़यंत्र करते हैं ।
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इन मारीचों की मायावी आवाज को पहचानो। अपने पर्व अपनी रीति नीति और संस्कृति के अनुसार मनाओ । 

Saturday, 23 September 2017

प्राचीन मौसम विज्ञान

#घाघ_भड्डरी की कहावतों को परखें | कल श्रावण शुक्ल सप्तमी हैं | अपने-अपने स्थान का मौसम जांचें |

'श्रावण शुक्ला सप्तमी, डूब के उगे भान,
तब ले देव बरिसिहैं, जब सो देव उठान।'
-सावन शुक्ल सप्तमी को यदि सूर्य बदली में डूब कर उगे तो कार्तिक माह में देवोत्थान एकादशी तक अवश्य वर्षा होती है।
'श्रावण शुक्ला सप्तमी, उगत दिखे जो भान,
या जल मिलिहैं कूप में, या गंगा स्नान।'
-यानि सावन माह की शुक्ल पक्ष की सप्तमी को प्रात: सूर्य का उगना दिखे तो घाघ के अनुसार निश्चित रूप से सूखा पड़ेगा।
सावन सुक्ला सत्तमी, जो गरजे अधिरात।
तू पिय जाओ मालवा, हम जायें गुजरात।।
-यदि श्रावण शुक्ल सप्तमी को अर्धरात्रि में बादल गरजें, तो हे प्रिय तुम मालवा चले जाना और मैं गुजरात चली जाऊँगी अर्थात् अकाल पड़ने वाला है |
सावन सुक्ला सत्तमी, गगन स्वच्छ जो होय।
कहै घाघ सुन भड्डरी, पुहुमी खेती खोय।।
- सावन महीने के शुक्ल पक्ष की सप्तमी को यदि आसमान साफ हो तो घाघ कहतें हैं कि हे भड्डरी! यह जान लो कि अकाल पड़ने वाला है और खेती नष्ट हो जायेगी।
सावन मास बहै पुरवाई।
बरधा बेंचि बेसाहो गाई।।
- जब श्रावण मास में पुरवाई चले तो कृषक को चाहिए कि वह अपने बैलों को बेचकर गाय खरीद ले क्योंकि सूखा पड़ने के आसार हैं जिसमें खेती नहीं हो सकेगी।
सावन सूखा स्यारी।
भादौं सूखा उन्हारी।
स्यार-खरीफ। उन्हारी-रबी की फसल।
- यदि सावन मास में वर्षा न हुई तो खरीफ की फसल को अत्यधिक नुकसान होता है इसी प्रकार यदि भादों में वर्षा न हुई तो रबी की फसल नष्ट हो जाती है।

Friday, 7 April 2017

#अखण्ड_भारत_का_केन्द्र_बिन्दु 
बात १९९२-९३ की है | आमला ( भारतीय वायुसेना का शस्त्रागार) में १४ अगस्त को अखण्ड भारत स्मृति दिवस का आयोजन था | जिसमें प्रोफ़ेसर सदानन्द सप्रे जी का भाषण होना था | हमने आमला नगर में खूब प्रचार किया | सेना के सेवानिवृत्त अधिकारी भी काफी संख्या में कार्यक्रम में आये | शेष बड़ी संख्या में वायुसेना के अधिकारियों ने दूर खड़े होकर सप्रे जी का अखण्ड भारत विषय पर प्रेरक उद्बोधन सुना | कार्यक्रम के बाद सेना के अधिकारियों ने बताया कि आप जिस अखण्ड भारत की बात करते हैं उस अखण्ड भारत का केन्द्र बिन्दु तो यहीं पास में बरसाली नामक गाँव में हैं | हमारी उत्सुकता जगी | मैं कुछ युवा साथियों को लेकर बरसाली गया, सतपुड़ा की सुरम्य और उत्तुंग पर्वत श्रंखलाओं के मध्य बैतूल से १४ किलोमीटर दूर ग्राम बरसाली यूँ तो बैतूल जिले का एक बहुत सामान्य सा गाँव है, जहाँ लोग खेती और पशुपालन द्वारा अपना जीवन निर्वाह करते हैं | गन्ने की खेती के लिए भी यह क्षेत्र प्रसिद्ध है | कभी यह क्षेत्र खेड़ला किला (बरसाली से दस किलोमीटर दूर) के गौरवमयी इतिहास के साथ जुड़ा, जहाँ सैंकडों वर्षों तक गौंड राजाओं का राज्य रहा | अजंता-एलोरा की गुफाएं बनाने वाले "राजा इल" के समृद्धशाली राज्य का भी यह हिस्सा रहा | खेड़ला किला पर मराठी का आद्द्य ग्रन्थ "विवेक सिंधु" की रचना महाकवि संत मुकुन्द स्वामी जी ने की | 
 खैर ..लोगों से चर्चा करने पर ध्यान आया कि गाँव के लोग उस स्थान को एक देव स्थान के रूप में मानते हैं | अखण्ड भारत के केन्द्र बिन्दु होने की बात पहली बार हमने उनको बताई | जब केन्द्र बिन्दु स्थान पर पहुँचे तो वहाँ एक बड़ा सा पत्थर पहाड़ी के नीचे पड़ा था, जिस पर अस्पष्ट कुछ लिखा हुआ है | गाँव के लोग इस पत्थर को सैंकडों वर्ष पुराना मानते हैं तथा पीढ़ी दर पीढ़ी देखते आ रहे हैं | मान्यताओं के अनुसार यही वह पत्थर है जो राजा टोडरमल (राजा टोडरमल ने विश्व की प्रथम भूमि लेखा-जोखा एवं मापन प्रणाली तैयार की थी) ने लगभग ५०० वर्ष पूर्व अखण्ड भारत के केन्द्र बिन्दु के रूप में यहाँ स्थापित किया था | ग्राम बरसाली जम्मू से कन्याकुमारी रेलमार्ग पर मध्य रेलवे के इटारसी - नागपुर रेल खण्ड पर स्टेशन के पास स्थित है। यहाँ पेसेंजर गाडियां रुकती है |
इस बीच कई बार केन्द्र बिन्दु पर जाना हुआ | बैतूल के सुधी नागरिकों ने उस पत्थर को स्थापित करवाया | 
८ फरवरी २०१७ को बैतूल में सम्पन्न ऐतिहासिक हिन्दू सम्मेलन के मुख्य अतिथि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के परम पूज्य सरसंघचालक मोहनराव जी भागवत ने भी बैतूल का उल्लेख अखण्ड भारत के केन्द्र बिन्दु के रूप में किया | तब से पुनः उस स्थान पर जाने की इच्छा थी | आज श्री सुरेन्द्र जी सोलंकी, श्री बुधपाल सिंह जी और श्री Anand Prajapati जी के साथ बरसाली जाना हुआ | ग्राम सरपंच श्री पुरुषोत्तम यादव जी के साथ ग्रामीणों से विस्तृत चर्चा हुई | ग्राम बुजुर्गों ने बताया कि यह लगभग दस फिट की शिला थी जिसमे से आधी शिला कई वर्ष पूर्व ग्राम मोरनढाना के कोई केशव पटेल जी ले गए , जिसकी उन्होंने श्री हनुमान जी की प्रतिमा बनाकर गाँव में स्थापित की |
सरपंच महोदय ने बताया कि यहाँ वायुसेना के बहुत से अधिकारी आते रहते हैं | गाँव के लोग वार-त्यौहार पर शिला के सम्मुख दीप जलाते हैं | वहाँ तक पहुँचने का मार्ग दुर्गम है | इस स्थान की एक ओर विशेषता है कि यहाँ की मुख्य पहाड़ी पश्चिम छोर का पानी माचना नदी से तवा होते हुए नर्मदा मैया के द्वारा सिंधु (अरब) सागर में जाता है तथा पूर्व दिशा का पानी बेल नदी के द्वारा कान्हान होते हुए वर्धा नदी से वेनगंगा होते हुए माँ गोदावरी के द्वारा गंगा सागर (बंगाल की खाड़ी) में मिलती है |
गाँव वालों की इच्छा है कि यहाँ पर्यटक स्थल बनें और हमारा गाँव पुनः दुनियाँ के नक़्शे में दिखने लगे | 
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कुछ भी हो...बैतूल है बहुत अद्भुत...अखण्ड भारत बनाने का एक सूत्र भी यहाँ विद्यमान है |
#भारत_माता_की_जय

Thursday, 23 February 2017

|| #सोनाघाटी की पहाड़ी और #सतपुड़ा_के_घने_जंगल ||

|| #सोनाघाटी की पहाड़ी और #सतपुड़ा_के_घने_जंगल ||
देवाधिदेव महादेव की कृपा से महाशिवरात्रि के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर सोनाघाटी शिव मन्दिर के दर्शन करने का सिलसिला जो १९९२ से प्रारम्भ हुआ आज तक जारी है | सोनाघाटी बैतूल की वह पहाड़ी है जिसने बैतूल के पर्यावरण को अब तक सम बनाकर रखा था | पिछले दस-पन्द्रह वर्षों में इस पहाड़ी को छिन्न-भिन्न करने का जो पाप किया जा रहा है, उसके दुष्परिणाम भी सामने आ रहे है | फोरलेन ने तो इस पहाड़ी का कबाड़ा ही कर दिया | कभी मार्च अन्त तक घरों में पंखे बन्द रखने वाला बैतूल अब फरवरी में ही तपने लगा है | कभी वर्ष भर सुन्दर बहने वाली सोनाघाटी पहाड़ी से निकली नदी अब गंदे नाले में बदल गई है |
सोनाघाटी की श्रंखलाबद्ध पहाड़ी को पहली बार १८९३-९४ में काटा गया था जब इटारसी-नागपुर रेलवे लाईन बिछाई गई थी | लैकिन तब जंगल घना होने तथा पहाड़ी को तिरछा काटने से बैतूल नगर के तापमान में कोई विशेष अंतर नहीं आया होगा | उसी समय यह पहाड़ी दो भागों में विभाजित हुई और कभी एक ही पहाड़ी पर बने शिव और हनुमान मन्दिर पृथक हो गए |
परन्तु जंगल तब भी बहुत घना रहा होगा, यह इस बात से सिद्ध होता है कि प्रकृति के चितेरे कवि दादा #भवानीप्रसाद_मिश्र ने सोनाघाटी की इसी पहाड़ी पर बैठकर १९३९ में अपनी कालजयी रचना “सतपुड़ा के घने जंगल, ऊँघते अनमने जंगल” लिखी थी | बैतूल और दादा भवानी प्रसाद मिश्र जी के जानने वालों का मानना है कि यह रचना दादा ने हनुमान मन्दिर की पहाड़ी पर बैठकर लिखी थी | तब से हर वर्ष मैं भगवान शिव और बजरंग बली के साथ उस शिला को भी नमन करके आता हूँ |
अभी दो वर्ष पूर्व मिश्र जी के जन्मशताब्दी वर्ष में हमारे विद्यालय भारत भारती ने इस कालजयी रचना को सोनाघाटी से महज डेढ़ किलोमीटर दूर अपने विद्यालय परिसर में पत्थर पर खुदवाकर धरोहर बनाया है और मिश्र जी का जो जंगल अब बीस किलोमीटर दूर चला गया उसकी भरपाई के लिए पौधरोपण और संरक्षण का कार्य भी भारत भारती के द्वारा हो रहा है |
जब इस कविता को पत्थर पर खुदवाने की जानकारी भवानीप्रसाद मिश्र जी के बेटे व प्रसिद्ध पर्यावरणविद #अनुपम_मिश्र जी (दिल्ली) को मिली तो उन्होंने मुझे फोन कर खूब प्रशंसा की तथा एक बार भारत भारती आकर शिलालेख को देखने की तीव्र इच्छा प्रकट की थी | किन्तु शायद ईश्वर को यह स्वीकार नहीं था अनुपम जी यह शिलालेख देखे बिना ही इस नश्वर संसार से विदा हो गए |
हम बैतूलवासियों को प्रकृति के चितेरे और रक्षक पिता-पुत्र (दादा भवानी प्रसाद और अनुपम मिश्र जी) को अगर सच्ची श्रद्धांजलि देना है तो सम्पूर्ण सोनाघाटी की पहाड़ियों को न केवल बचाना पड़ेगा अपितु उसे हरियाली साड़ी पहनाकर श्रंगार कर रहे Arun Singh Bhadoriya जी जैसे प्रकृति पुजारियाँ का सहयोग भी करना होगा | पहाड़ों को बचाने के लिए ही हमारे पूर्वजों ने वहाँ देवालय स्थापित किये हैं | यह पूज्य भाव भी समाज का बना रहे, देवताओं के साथ पहाड़ और पेड़ भी पुजते रहे | यही आज का शिव संकल्प है | इति | -मोहन नागर
(आज प्रातः सोनाघाटी से लिए कुछ चित्र)
#महाशिवरात्रि की सभी मित्रों-शुभचिन्तकों को बधाईयाँ-शुभकामनाएँ |

Tuesday, 6 September 2016

गुजरात प्रवास

#गुजरात_प्रवास (भाग-१)
सड़क मार्ग से गुजरात प्रवास पर जाते समय रास्ते में सरस्वती विद्या प्रतिष्ठान के वाहन चालक श्री सुखदेव सिसोदिया का गाँव जामन्या (निवाली-बड़वानी) पड़ता है | सुखदेव भाई का आग्रह था कि दोपहर का भोजन घर पर करेंगे | हम दो गाड़ियों में Niranjan Sharma जी, बुधपाल सिंह जी, Gopal Soni जी,Roopsingh Lohane जी तथा हुकुमचंद भुवंता जी सहित आठ लोग थे | जैसे जी बारह बजे के लगभग सुखदेव भाई के घर पहुँचे तो वहाँ तीस-पैंतीस महिला-पुरुष मिलकर दाल-पानिया (मक्का की बाटी-उड़द की दाल) बना रहे थे |
मैंने सुखदेव भैया से कहा "क्यों भाई पूरा गाँव इकठ्ठा हो गया" |
सुखदेव ने कहा "नहीं भाईसाहब, ये सब मेरे एक ही परिवार के लोग है" |
हम सब को सुखद आश्चर्य हुआ कि गाँवों में आज भी सयुंक्त परिवार इतनी बड़ी संख्या में रहता है | ये सब सुखदेव भाई के पिताजी श्रद्देय गारदिया जी के स्नेह व समन्वय का ही प्रताप है | चर्चा करने पर उन्होंने बताया कि वे चार भाई में से अकेले बचे हैं | सभी भाईयों के बाल बच्चों की जवाबदारी उन्होंने ही निभाई है | उनका कुटुम्भ तो गाँव में चार सौ से अधिक संख्या का है | पर एक ही छत के नीचे चालीस से अधिक उनके तथा भाईयों के बच्चे, नाती-पोते रहते हैं |
घर पर अच्छी खेती है, सभी उन्नत खेती करते हैं | गाय-भैंस है, भोजन गोबर गैस पर बनता है | परिवार के कुछ सदस्य बाहर भी नौकरी करते हैं, लैकिन वार-त्यौहार पर सब इकठ्ठे हो जाते हैं |
भारत के सरल सहज जनजाति समाज ने न केवल प्राकृतिक सम्पदा को बचाकर रखा अपितु भारत की सांस्कृतिक विरासत और जीवन मूल्यों को भी संजोकर रखा है | दाल-पानिए का पेट भर रसास्वादन कर व पूरे परिवार को यथायोग्य प्रणाम कर हम अगले पड़ाव की ओर चल दिए |

#गुजरात_प्रवास (भाग-२)
गुजरात के भरूच जिले की मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र से लगी सीमा जनजाति बहुल है | ईसाई मिशनरियाँ देश के हर प्रान्त के सीमावर्ती क्षेत्रों में ही सेवा की आड़ में मतान्तरण का जाल बुनती है | भरूच की नेत्रंग तहसील के गाँव-गाँव में मिशनरियों की गतिविधियाँ चलती हैं | अनेक गाँवों में मतान्तरण भी हुआ है | 
गुजरात विद्या भारती द्वारा जब जनजाति क्षेत्र में कार्य विस्तार की बात आई तो सबका ध्यान इस क्षेत्र की ओर आया | तब २००६-०७ में "माधव विद्या पीठ" नामक एक शैक्षिक संस्थान की स्थापना नेत्रंग के पास काकड़कुई गाँव में हुई | गुजरात के जनजाति शिक्षा के अब प्रान्त प्रमुख श्री विजय भाई सुरतिया (Vijaysinh Suratia) ने तब चार वर्ष का अपना पूरा समय देकर उस बंजर जमीन को हरी-भरी करने तथा संस्थान को प्रतिष्ठा दिलाने के लिए कार्यकर्ताओं के साथ दिन-रात एक कर दिया |
तब जहाँ पीने का पानी डेढ़ किलोमीटर दूर से लाना पड़ता था | आज वहाँ आम, नीम, गुलमोहर, चन्दन सहित बीसीयों प्रजाति के वृक्ष फलफूल रहे हैं | ३०० से अधिक वसावा जनजाति के भैया-बहिन आवासीय विद्यालय में रहकर यहाँ नि:शुल्क अध्ययन कर रहे हैं | बच्चों का अनुशासन, सरलता, परिश्रम देखने लायक है | तीस से अधिक गिर गायों की सुन्दर गोशाला है | आसपास के गाँवों में शिक्षा के अनेक केन्द्र प्रारम्भ हुए हैं | अच्छे परीक्षा परिणाम और सुसंस्कारों के कारण अब लोग मिशनरियों के स्कूलों से बच्चों को निकालकर माधव विद्यापीठ में भर्ती कराने लगे हैं |
विद्या भारती की ग्रामीण और जनजाति शिक्षा में शिशु शिक्षा के पाठ्यक्रम पर यहीं शिशु वाटिका की अखिल भारतीय प्रमुख आशा बेन थानकी के मार्गदर्शन में सर्वश्री निरंजन जी, भुवंता जी, बुधपाल जी, गोपाल जी, रूपसिंह जी के साथ तीन दिन चिन्तन हुआ | इस हेतु आसपास के गाँवों में जाकर स्थानीय समाज से वार्तालाप भी हुआ | गुजराती, मालवी और निमाड़ी तीनों भाषाएँ सगी बहिनों की तरह होने से सबसे बातें करने में बहुत आसानी हुई | जहाँ जाओ वहाँ अपनी आदत अनुसार मैंने गौ आधारित कृषि के कुछ गुर भी बच्चों, आचार्यों व अभिभावकों को सिखाये |

#गुजरात_प्रवास (भाग-३)
नेत्रंग (भरूच) के आसपास के कुछ गाँवों में घूमने पर कहीं-कहीं पृथक "भीलीस्तान" बनाने के स्वर सुनाई दिए | कम ही लोग जानते हैं कि गुजरात के साबरकांठा, बनासकांठा, पंचमहल, दाहोद, नर्मदा, भरूच, तापी, डांग, सूरत, नवसारी, वलसाड और इससे जुड़े हुए राजस्थान के बाड़मेर, जालौर, सिरोही, उदयपुर, बांसवाड़ा और मध्यप्रदेश के रतलाम, झाबुआ, अलीराजपुर, बडवानी, धार, महाराष्ट्र के नंदुरबार, धुले, नासिक आदि जिलों को मिलाकर एक नया राज्य की चर्चा अनेक वर्षों से है|
जागरूक ग्रामीणों से चर्चा करने पर ध्यान में आया कि इस क्षेत्र में आन्दोलन को अंदर से खाद-पानी देने का काम मिशनरियाँ और अपने बिहार वाले इशरत के अब्बू का दल भी वहाँ लोगों को यूनाइटेड कर रहा है | एक समय जनता दल गुजरात में प्रभावशाली राजनीतिक दल था, अब उसके कुछ अवशेष भरूच जिले में ही बचे हैं | लोगों ने बताया कि यहाँ भी चर्च और#लाल_गुलाम एक ही थेली के चट्टे-बट्टे हैं |

एक गाँव के किनारे पहाड़ी पर बनी कब्र पर क्रास लगा देखकर मैंने स्थानीय ग्रामीणों से पूछा तो उन्होंने बताया कि जनजाति समाज के किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाने पर उस क्षेत्र का पादरी मुर्दाखोर की तरह सूँघते हुए उस गाँव में पहुँच जाता है और मृतक के परिवार पर दबाव बनाकर कि मृतक कभी चर्च में आता था, यह हवाला देकर उसे दफनाने पर विवश करता है तथा उसकी कब्र पर क्रास लगवाता है | जबकि यहाँ के जनजाति समाज में अब अन्तिम क्रिया दाह संस्कार के द्वारा होने लगी है |
कुल मिलाकर समाज विघातक शक्तियाँ हमारे समाज को तोड़ने का षड्यंत्र देश के हर कोने-कुचारे में वर्षों से अबाध गति से चला रही थी | संघ और उससे प्रेरित संगठन उसे रोकने में अथवा अनेक स्थानों पर उनकी असलियत समाज को बताने में समर्थ हुए हैं | "वे" इसीलिये तो#संघ_मुक्त भारत चाहते हैं |
#गुजरात_प्रवास (भाग-४)
वापसी में सबकी इच्छा "स्टैच्यू आफ यूनिटी" स्थल देखने की हुई | यह स्थान भरूच के पास नर्मदा जिले में सरदार सरोवर बाँध से सवा तीन किलोमीटर की दूरी पर साधु बेट नामक स्थान पर नर्मदा जी के बीचोंबीच एक टापू पर है | यहीं पर लोहपुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल का दुनियाँ में सबसे ऊँचा (१८२ मीटर) स्मारक बनने वाला है | इस विशालकाय भव्य मूर्ति का शिलान्यास २०१३ में नरेन्द्र भाई जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे, तब कर चुके हैं | 
एक तरफ विन्ध्याचल तथा दूसरी ओर सतपुड़ा पर्वत है | माँ नर्मदा के एकदम मध्य में यह स्मारक बन रहा है | जब हम वहाँ पहुँचे तो स्मारक स्थल तक अभी जाने की अनुमति नहीं होने से किनारे से ही निर्माणाधीन स्मारक को देखा | आधार का काम लगभग पूर्णता की ओर है | वहाँ के एक अधिकारी से चर्चा करने पर उन्होंने बताया कि इस स्मारक के आगे एक बाँध ओर प्रस्तावित है, जहाँ पण बिजली से निकलने वाले जल को संग्रहित कर उसे पुनः सरदार सरोवर में लिफ्ट किया जायेगा | तब यह स्मारक पूर्ण रूप से जल के मध्य में होगा |
सरदार सरोवर के सामने लगी लोहपुरुष की प्राचीन प्रतिमा को प्रणाम कर विशालकाय पण बिजली घर को देखकर वहाँ से निकली नदियों के समान नहरों के किनारे-किनारे आगे बढ़ते हुए हम मध्यप्रदेश के अलीराजपुर नगर होते हुए निरंजन जी के गाँव झापड़ी में उनके खेत में खटिया पर यात्रा की थकान दूर कर घर में गरमागरम पराठे खाकर अपने-अपने गंतव्य की ओर प्रस्थान कर गए |
|| इति ||
#माँ 
- माँ सुबह चार बजे से उठकर घट्टी (चक्की) में ज्वार पीसते हुए गीत गाती थी, वो आवाज सौ लता मंगेशकर से भी मीठी होती थी |
- माँ सुबह साढ़े चार बजे राई घुमाकर दहीं से मक्खन अलग कर जो छाछ बनाती थी, दुनियाँ का कोई पेय आज भी उसके मुकाबले का नहीं है |
- माँ सुबह पाँच बजे गाँव की कुण्डी (छोटा कुआ) से रस्सी से खींचकर मटके में पानी भरकर लाती थी, वो स्वाद दुनियाँ का कोई आरो वाटर नहीं दे सकता |
- मेरी बिना पढ़ी-लिखी माँ रोज सुबह खटिया के पास चिमनी जलाकर तथा स्कूल का झोला सिरहाने रखकर कहती "उठ , भण बेटा" | दुनियाँ का कोई शिक्षक यह नहीं कर सका |
- स्कूल का समय होते ही माँ काला टीका लगाकर झोला कंधे में टांगकर भेज देती, हम हमेशा मास्टर जी से पहले स्कूल पहुँच जाते | तब कोई घड़ी नाम की चीज घर पर नहीं थी |
- संवेदना की पराकाष्ठा तो तब हो जाती, जब भूख लगने को होती ही थी कि माँ आवाज लगा देती "जीम ले बेटा", |
- जब भी आइसक्रीम वाला गाँव में आता था , मैं दुनियाँ के सबसे अमीर घर का बच्चा होता था, क्योंकि माँ के पल्लू में पंजी-दस्सी रहती ही थी |
- मैं जब खेत पर जाता तो माँ खेत पर मिलती, जब घर पर आता था तो माँ घर पर मिलती | मैं खेलते हुए गाँव की किसी भी गली में गिर जाता, माँ तुरन्त आकर उठा लेती थी, ब्रहमाण्ड के किसी धर्म का भगवान इतना अंतरयामी नहीं हो सकता |
- अभी भी जब कभी घर पर माँ से मिलकर जिस स्थान के लिए निकलता हूँ, पहुँचने के दस-पाँच मिनिट आगे पीछे छोटे का फोन आ जाता है कि माँ पूछ रही "पहुँच गए क्या" ...|
#प्रकृति 
बादल 
अक्सर रास्ता भटक जाते हैं,
क्योंकि वे 
सड़क-सड़क नहीं 
पेड़-पेड़ चलकर आते हैं |
#ओटला (काव्य संग्रह)
=============== 
बचपन में गाँव के घर के बाहर का “ओटला” (घर की बाहरी दीवार से सटा चबूतरा) ही अपना संसार था | उसी “ओटले” पर खेले कूदे बड़े हुए | हर सप्ताह घर के ओसारी-आँगन की लिपाई के साथ ओटला भी गोबर से लीपकर माँ उस पर पाण्डू (सफ़ेद रंग की मिट्टी) से एक बड़ा “मांडना” बनाती थी | जाड़े में सूरज सबसे पहले ओटले पर ही आता था और चौमासा शुरू होने के पहले दादाजी उसी ओटले पर बबूल और पलास की लकड़ी और पूस से बने टट्टे डाल देते थे, एक बूँद पानी नहीं आता था | दादाजी, पिताजी और काका लोग तथा आसपड़ोस के बड़े-बूढ़े सावन-भादौ की झड़ियों में ओटले पर ही इकठ्ठे होकर पलास की जड़ और सन से गाय-बैल तथा अन्य पशुओं के लिए रस्सियाँ और उनके मोरे, जोत, रास, सुंडे तथा कुए-बावड़ी से पानी खींचने वाली पतली-मोटी रस्सियाँ बनाते थे |
यह सब करते हुए मौसम की कहावतें, अच्छी बैल जोड़ियां, गाँव के नदी-तालाब के किस्से तथा पूरे परगने के नात-भांत पर चर्चाएँ होती रहती थी | हम बच्चे भी मटके से निकालकर अम्मा द्वारा दिए हुए होले (सिके हुए चने) चबाते हुए कुतुहल से उनकी बातें सुनते रहते | कभी बाल भारती पढ़ते तो कभी रस्सी बनाना सीखते |
समय का पहिया बड़ी तेजी से घूमा | गाँव, क़स्बा, नगर, महानगर घूमते हुए चार-पाँच दशक बीत गए, लैकिन मन में ग्राम्य जीवन ही बसा रहा | जहाँ भी रहा गाँवों से जीवन्त सम्पर्क बना रहा |
लैकिन बचपन वाला गाँव कहीं खो गया | घर के सामने बना ओटला अब कमरे में बदल गया | पहले गाँव में नमक, जर्दा-सुपारी तथा कुछ कपड़े ही शहर से आते थे | बाकी जरूरतों की सारी चीजें छोटे से गाँव में ही बनती थी | मतलब हर गाँव एक बिग बाजार या मॉल था | अब तो गाँव में हर चीज के लिए शहर दौड़ना पड़ता है | समझ नहीं आता हम तब पिछड़े थे या अब..| मेरे बचपन के सामने कभी अपने गाँव में पानी की समस्या नहीं आई क्योंकि गाँव के बड़े तालाब में सालभर पानी रहता था और उसी की बाजू से निकली छोटी नदी की रेत में झिरी खोदकर हम जेठ में भी पानी पी लेते थे | लैकिन अब तालाब भी सिकुड़ गया, नदी तो चैत में ही मर जाती है | उस जमाने के सार्वजनिक जामुन, आम, खजूर सब खतम हो गए | नए किसी ने लगाए नहीं, अगर है तो वे हाइब्रिड बाग-बगीचे किसी के निजी है | अब नई पीढ़ी में पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ी है | शासन और समाज मिलजुलकर इस ओर एक कदम आगे बढ़ाया है | लैकिन आज बहुत बड़े आन्दोलन की आवश्यकता है | पर्यावरण के राक्षसों से पंचतत्वों की रक्षा एक बड़ी चुनोती है |
उसी से उपजी कुछ पीड़ायें इस “ओटला” काव्य संग्रह में है | मालवा, राजस्थान को छोड़कर "ओटला" हिन्दी के अन्य पाठकों के लिए नया शब्द होगा | “चातुर्मास” के बाद यह मेरा दूसरा काव्य संग्रह है | हरि इच्छा, कब तक यह संग्रह पुस्तक के आकार में जन्म लेता है | इसी में हर दिन एकाध घंटा पिछले एक माह व्यस्त था | इसीलिये फेसबुक के मित्रों से लम्बे समय बाद प्रत्यक्ष भेंट हो रही है | सभी को राम-राम |
|| बैतूल का पर्यावरण ||
#सोनाघाटी की पहाडियाँ पर्यावरण संतुलन के लिए #बैतूल नगर के लिए वरदान है | कभी इन्हीं पहाडियों पर आच्छादित घने वन के कारण अंग्रेजों ने यहाँ अपनी बस्ती बसाई थी | इन्हीं पहाडियों पर बैठकर महाकवि दादा #भवानीप्रसाद_मिश्र ने १९३९ में अपनी कालजयी रचना "#सतपुड़ा_के_घने_जंगल-ऊँघते अनमने जंगल" लिखी थी | बैतूल के पूर्व से पश्चिम की तरफ घेरे रखने वाली ये पहाडियाँ अब लगभग वृक्षविहीन है | लेंटाना सहित कुछ अन्य काँटेदार जंगली झाडियाँ भर बची है | हर साल पुराने वृक्षों के ठूँठों से सिसकती बड़ी होती डालियों को लोग नोच ले जाते हैं | पहाडियों के कई हिस्से अवैध उत्खनन के कारण क्षत-विक्षत है | लगातार खुदाई तथा बचे हुए छोटे-बड़े पेड़ों की अवैध कटाई देखकर ऐसा लगता है मानो पूरा बैतूल इन पहाडियों को जितनी जल्दी हो खा जाना चाहता है |
वर्ष २०१६ बैतूल इतना गरम कभी नहीं हुआ | मैं भारत भारती में पिछले बीस साल से रह रहा हूँ | हर मौसम में #भारत_भारती में बैतूल से दो-तीन डिग्री तापमान कम रहता है | लैकिन पिछले दो वर्ष से भारत भारती क्षेत्र का पर्यावरण भी खराब हो गया | इसका सबसे बड़ा कारण फोरलेन के लिए खोदी गई सोनाघाटी की पहाड़ी है | जो पूर्व , उत्तर तथा उत्तर-पश्चिम की ओर घने जंगलों से से आने वाली ठंडी हवाओं को वर्ष भर रोकती थी | इसे के कारण यहाँ गर्मी कम पड़ती थी तथा वर्षा भी सम होती थी | विशालकाय पहाड़ी खुद जाने से वह एक चिमनी या एक्जास पंखे का काम करने लग गई है |
भारत भारती के क्षेत्र में पिछले दो वर्षों से हो रही भयंकर ओलावृष्टि का मुख्य कारण भी मुझे यह पहाड़ी में बन गया विशालकाय बोगदा ही लगता है | खैर विकास का क्रम भी आवश्यक है किन्तु अब क्या किया जाए ?
बैतूल जिला शासन-प्रशासन ने इस वर्ष एक बड़ी पहल की है #ताप्ती_वन_महोत्सव के नाम से सोनाघाटी की एक पहाड़ी को नगर भर के लोगों ने हरी-भरी करने का संकल्प लिया है | कल बड़ी संख्या में यहाँ नीम के पौधे रोपे गए हैं | जल संवर्धन की दृष्टि से खन्तियाँ भी खोदी है |Collector Betul मा. पाटिल जी व्यक्तिगत रूचि लेकर यह कार्य कर रहे हैं |
बैतूल के सभी पर्यावरण प्रेमियों से आग्रह है कि इस वर्षा ऋतु में एक बार सोनाघाटी (पोलिटेक्निक कालेज के पीछे) जाकर एक पौधा लगाकर आयें तथा समय-समय पर उसकी देखरेख करें | पोलिटेक्निक महाविद्यालय के प्राचार्य व पर्यावरण के लिए समर्पित व्यक्तित्व श्रीArun Singh Bhadoriya जी पिछले डेढ़ दशक से उस क्षेत्र को हरा-भरा करने में लगे हैं | हम सब उनके सहयोगी बनें तथा अपने बैतूल का मौसम फिर पच्चीस साल पूर्व जैसा बनाएँ जिसमें अप्रेल-मई में भी पंखो की जरुरत नहीं पड़ती थी |
#गाय_बचा_लो 
आज के परिवेश में घर में गोपालन कठिन है | गाँवों में भी अब धीरे-धीरे नगरों के समान घर बनने लगे हैं | पहले घर के बाहर चबूतरा, घर के अंदर प्रवेश करते ही सबसे पहले गाय का कोठा उसके बाद आँगन और फिर अन्य आवश्यक कमरे, रसोई आदि होते थे | बदलते युग में अब वह सब छूटता जा रहा है | आधुनिक रहन-सहन तथा कई विवशताओं के कारण अब यह सब सम्भव भी नहीं हैं |
किन्तु खेती और परिवार के स्वास्थ्य के लिए गोपालन तो आवश्यक है | इसलिए समझदार किसान अपने खेत-कुए पर ही झोपड़े बनाकर वहीं गोपालन करते हैं | खेत का रखवाला या घर का कोई सदस्य उनकी देखरेख करता है | लैकिन यह संख्या नगण्य है |
हिन्दू धर्म में अत्यन्त उपयोगी पेड़, वनस्पति, जीव-जन्तु को पूज्य स्थान पर रखा गया है | गाय उनमे से एक है | गाय केवल मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए ही नहीं तो पञ्च महाभूत (क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा) की रक्षा के लिए आवश्यक है | अनेक वैज्ञानिक कसौटियों पर यह कसा जा चुका है, इसे बार-बार सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं हैं | पृथ्वी पर गाय खत्म होने से अनेक संकट खड़े हो जायेंगे | यह धीरे-धीरे होने भी लगा है |
जैसे माँ के मर जाने से छोटे बच्चों की क्या स्थिति हो जाती है | वही स्थिति सम्पूर्ण जीव-जन्तुओं की हो जायेगी | इसलिए गाय को "विश्वस्य मातरः" कहा गया है |
भारत में विज्ञान को धर्म के माध्यम से ही बताया गया है | इसलिए गाय को धार्मिक मान्यता देकर उसमे सभी देवों का वास बताकर माता का दर्जा दिया गया | सदियों तक भारतीय समाज ने इसका पालन भी किया | अभी भी कोई सब कुछ खत्म नहीं हुआ है |
किन्तु जिस मात्रा में आवश्यक है उतना आज के परिवेश में गो का पालन, संवर्धन और संरक्षण एक चुनौती है | लगातार होते औद्योगीकरण, खत्म होते चरागाह, रासायनिक तथा मशीनीकृत खेती के कारण गाय के लिए सड़कों के अलावा कहीं जगह बची नहीं हैं | लैकिन मूल भारतीय समाज के मन में अभी भी गाय के लिए श्रद्धाभाव है | लैकिन वो विवश है | इसलिए पूरे देश की तरह गायें भी सरकारी तंत्र के भरोसे होकर दुर्दशा को प्राप्त हो गई |
गाय बचेगी तो सिर्फ किसान के खूंटे पर..| यह बात जब तक किसान को फिर से समझ न आ जाए तब तक गाय को गोशालाओं आदि में ही बचाना पढ़ेगा | सुधी जन गोशालाओं को समृद्ध करने की और ध्यान दें तथा समय-समय उसका निरीक्षण भी करें | बहुत जल्दी ही पुनः गोसेवा युग प्रारम्भ होगा | व्यर्थ के वाद-विवाद में न उलझते हुए बस इस थोड़े से संकट काल में गोमाता को बचा लें | यही प्रार्थना ..|
#गावो_रक्षति_रक्षितः 
बरसात का पानी धरती के अंदर जाता कैसे है ?
बाँध, तालाब आदि मानवनिर्मित तंत्र के अलावा एक तो ग्रीष्म काल में सूर्यताप से धरती के अंदर मिट्टी में नमी कम हो जाने से दरारें पड़ जाती है, जिससे वर्षा जल गिरते ही इन दरारों से धरती के अंदर समाने लगता है | तथा दूसरा महत्वपूर्ण कारण है धरती के अंदर पग-पग पर छोटे-बड़े छिद्र होते हैं जिन्हें पृथ्वी पर पाए जाने वाले जीव-जन्तु बनाते हैं | ये जीव अपना घर बनाने के लिए धरती के अंदर हजारों छेद करते हैं तथा वर्षाऋतु आने पर अपने घरों से अपने अंडे-बच्चे लेकर पेड़ों पर या ऊँचे स्थान पर चले जाते हैं |
इन अरबों-खरबों जीव-जन्तुओं को प्रतिदिन भोजन के लिए धरती के ऊपर ही आना पड़ता है , तथा हरबार नया छिद्र बनाकर निकलना पड़ता है | जिससे जमीन पोली हो जाती है तथा वर्षा जल वहीं से धरती के अंदर जाकर जमा हो जाता है, जिसको हम विभिन्न माध्यमों से खींचकर सालभर उपयोग करते हैं |
पिछले बीस वर्ष में मैंने अपने अनुभव से जाना है कि जमीन के अंदर रहने वाले इन छोटे-छोटे असंख्य जीवों के लिए गाय का गोबर सबसे सबसे अच्छा खाद्य है | गाय का गोबर जहाँ गिरता है, वहाँ जमीन से अनेक प्रकार के जीव निकलकर उसे एक-दो दिन में ही चट कर जाते हैं | गाय के गोबर में केंचुओं की संख्या बढ़ाने की अद्भुत क्षमता है और केंचुआ धरती को उपजाऊ बनाने सबसे बड़ा माध्यम है | केंचुआ मिट्टी के अंदर पड़े अपशिष्ट खाता है तथा मलत्याग धरती के ऊपर आकर करता है | जिससे धरती पोली और भुरभुरी बनती है, ऐसी मिट्टी में फसलों की जड़ें गहरी जाती है | तथा धरती में जलधारण करने की क्षमता भी बढ़ती है |
इसलिए कहा गया है जहाँ गाय कम हो जायेगी वहाँ जमीन की उर्वरकता कम होती जायेगी तथा धरती के अंदर का भी जल सूखता जायेगा | जैवविविधता की रक्षा करने में गाय सक्षम हैं , हमें केवल गाय की रक्षा करनी है |

कृषि नीति

#कृषि_नीति 
अंग्रेजों के आने के पूर्व भूमि का बंदोबस्त गाँव के लोग ही करते थे | भूमि किसी की नहीं अपितु गाँव की होती थी | एक से दूसरे गाँव के बीच काकड़ अथवा मेढा हुआ करता था | गाँव के लोग मिल बैठकर कृषि, चरागाह तथा वन क्षेत्र की भूमि का स्थान तय करते थे | प्रति दस वर्ष में चरागाह और कृषि भूमि की अदला-बदली होती थी | पड़त भूमि पर गोबर और गोमूत्र गिरने से वह फिर से उपजाऊ जाती थी | अंग्रेज लोग चाहे भूमि का बँटवारा कर गए किन्तु पड़त और कृषि भूमि का यह परिवर्तन आजादी के बाद भी होता रहा |
लैकिन पिछले तीस-चालीस वर्षों में यह बदलाव न के बराबर हुआ है | चरागाह लगभग समाप्त हो गए और कृषि योग्य भूमि पर लगातार खेती वो भी एक ही प्रकार की हो रही है | ऊपर से रसायन और कीटनाशकों ने भूमि का जो सत्यानाश किया है वो अलग ..| 
अगर हमें अपनी धरती पुनः सुजलाम् सुफलाम् बनाना है तो किसी भी रूप में उसमे गोबर और गोमूत्र का प्रयोग करना ही होगा |

भुजरिया विज्ञान

#भुजरिया_का_विज्ञान 
आजकल तो अन्न के बीज को सुरक्षित रखने तथा उसके परीक्षण के अनेक तरीके विकसित हो गए हैं | किन्तु प्राचीन काल से भारत में अगले एक वर्ष तक बीज को सुरक्षित रखने के भी तरीके थे | पहले घरों में भिन्न-भिन्न प्रकार की मिट्टी की कोठियाँ बनती थी, जिसमे नीम आदि की पत्तियाँ मिलाकर उसे वायुरोधक बनाकर अलग-अलग कोठियों में बीज रखा जाता था | 
इसके साथ ही उस सुरक्षित बीज का समय-समय पर परीक्षण भी किया जाता था |
#पहला 
- चैत्र मास में जब बीज रखा जाता था तो अच्छा बीज किस खेत का है, उसी खेत की मिट्टी लाकर उसे घर में #चैत्र_नवरात्रि में देवस्थान पर लाकर उगाया जाता था | जिसे हम जुआरे कहते हैं | जिस खेत का अन्न अच्छा उगता था, उसमें से बीज के लिए तिगुना रख लिया जाता था | शेष अन्न वर्षभर खाने के लिए रख लिया जाता था, ज्यादा होने पर बेच दिया जाता था |
#दूसरा
- बीज का दूसरा परीक्षण सावन मास में किया जाता था, कोठियों से अन्न निकालकर कि कहीं बीज में घुन तो नहीं लगा, उसे सावन शुक्ल नवमी को खेत से महुए के पत्तों और बाँस की टोकरी में मिट्टी लाकर पुनः बोया जाता था | इसे भुजलिया/कजलिया के नाम से जाना जाता है | भाद्र कृष्ण प्रतिपदा (आज के दिन) को इन भुजलियों की शोभायात्रा धूमधाम से निकाली जाती थी | हर किसान एक-दूसरे का बीज कैसा उगा यह देख भी ले इसलिए नदी-सरोवर आदि में जुआरे धोकर उसे एक-दूसरे को भेंट दिया जाता था | लोग इसी समय बीज की अदला-बदली भी कर लेते थे |
#तीसरा
- तीसरा परीक्षण बुआई के ठीक पहले #शारदीय_नवरात्रि में देवी जी के यहाँ सार्वजनिक रूप से जुआरा लगाने की परम्परा सदियों से है | पुनः जिस खेत में बुआई करना है उसकी मिट्टी लाकर मिट्टी के पात्र में अन्न उगाया जाता है | जिस कोठी का सबसे अच्छा उगता उसे बीज के लिए तथा बाकी को अगले चार माह भोजन के रूप में उपयोग हो जाता था |
- आज सिद्ध हुआ है कि जुआरे केंसर रोधी है | हमारे यहाँ तो सदियों से जुआरे का रस पीने की परम्परा है | नदियों-सरोवरों में जुआरे धोने के बाद उसमें से आधे जुआरे गाँव के मन्दिर में चढ़ा दिया जाता था, मन्दिर का पुजारी उसे बाँटकर रस निकालकर शाम को संध्या आरती में भगवान के चरणामृत के रूप में सबको बाँटता था |
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बीज बचाने की इस अद्भुत प्रयोगशाला को हमारे पूर्वजों ने धर्म के साथ जोड़कर उसे त्यौहार का रूप दे दिया | जिसे हम आज भी धूमधाम से मनाते आ रहे हैं | भुजलिया के इस पर्व को कुछ विद्वान भू-जल के संरक्षण से भी जोड़कर देखते हैं |
सभी मित्रों-शुभचिन्तकों को हरियाली विस्तार के शुभ पर्व #भुजलिया की हार्दिक बधाईयाँ-शुभकामनाएँ |