Tuesday, 6 September 2016

|| बैतूल का पर्यावरण ||
#सोनाघाटी की पहाडियाँ पर्यावरण संतुलन के लिए #बैतूल नगर के लिए वरदान है | कभी इन्हीं पहाडियों पर आच्छादित घने वन के कारण अंग्रेजों ने यहाँ अपनी बस्ती बसाई थी | इन्हीं पहाडियों पर बैठकर महाकवि दादा #भवानीप्रसाद_मिश्र ने १९३९ में अपनी कालजयी रचना "#सतपुड़ा_के_घने_जंगल-ऊँघते अनमने जंगल" लिखी थी | बैतूल के पूर्व से पश्चिम की तरफ घेरे रखने वाली ये पहाडियाँ अब लगभग वृक्षविहीन है | लेंटाना सहित कुछ अन्य काँटेदार जंगली झाडियाँ भर बची है | हर साल पुराने वृक्षों के ठूँठों से सिसकती बड़ी होती डालियों को लोग नोच ले जाते हैं | पहाडियों के कई हिस्से अवैध उत्खनन के कारण क्षत-विक्षत है | लगातार खुदाई तथा बचे हुए छोटे-बड़े पेड़ों की अवैध कटाई देखकर ऐसा लगता है मानो पूरा बैतूल इन पहाडियों को जितनी जल्दी हो खा जाना चाहता है |
वर्ष २०१६ बैतूल इतना गरम कभी नहीं हुआ | मैं भारत भारती में पिछले बीस साल से रह रहा हूँ | हर मौसम में #भारत_भारती में बैतूल से दो-तीन डिग्री तापमान कम रहता है | लैकिन पिछले दो वर्ष से भारत भारती क्षेत्र का पर्यावरण भी खराब हो गया | इसका सबसे बड़ा कारण फोरलेन के लिए खोदी गई सोनाघाटी की पहाड़ी है | जो पूर्व , उत्तर तथा उत्तर-पश्चिम की ओर घने जंगलों से से आने वाली ठंडी हवाओं को वर्ष भर रोकती थी | इसे के कारण यहाँ गर्मी कम पड़ती थी तथा वर्षा भी सम होती थी | विशालकाय पहाड़ी खुद जाने से वह एक चिमनी या एक्जास पंखे का काम करने लग गई है |
भारत भारती के क्षेत्र में पिछले दो वर्षों से हो रही भयंकर ओलावृष्टि का मुख्य कारण भी मुझे यह पहाड़ी में बन गया विशालकाय बोगदा ही लगता है | खैर विकास का क्रम भी आवश्यक है किन्तु अब क्या किया जाए ?
बैतूल जिला शासन-प्रशासन ने इस वर्ष एक बड़ी पहल की है #ताप्ती_वन_महोत्सव के नाम से सोनाघाटी की एक पहाड़ी को नगर भर के लोगों ने हरी-भरी करने का संकल्प लिया है | कल बड़ी संख्या में यहाँ नीम के पौधे रोपे गए हैं | जल संवर्धन की दृष्टि से खन्तियाँ भी खोदी है |Collector Betul मा. पाटिल जी व्यक्तिगत रूचि लेकर यह कार्य कर रहे हैं |
बैतूल के सभी पर्यावरण प्रेमियों से आग्रह है कि इस वर्षा ऋतु में एक बार सोनाघाटी (पोलिटेक्निक कालेज के पीछे) जाकर एक पौधा लगाकर आयें तथा समय-समय पर उसकी देखरेख करें | पोलिटेक्निक महाविद्यालय के प्राचार्य व पर्यावरण के लिए समर्पित व्यक्तित्व श्रीArun Singh Bhadoriya जी पिछले डेढ़ दशक से उस क्षेत्र को हरा-भरा करने में लगे हैं | हम सब उनके सहयोगी बनें तथा अपने बैतूल का मौसम फिर पच्चीस साल पूर्व जैसा बनाएँ जिसमें अप्रेल-मई में भी पंखो की जरुरत नहीं पड़ती थी |
#गाय_बचा_लो 
आज के परिवेश में घर में गोपालन कठिन है | गाँवों में भी अब धीरे-धीरे नगरों के समान घर बनने लगे हैं | पहले घर के बाहर चबूतरा, घर के अंदर प्रवेश करते ही सबसे पहले गाय का कोठा उसके बाद आँगन और फिर अन्य आवश्यक कमरे, रसोई आदि होते थे | बदलते युग में अब वह सब छूटता जा रहा है | आधुनिक रहन-सहन तथा कई विवशताओं के कारण अब यह सब सम्भव भी नहीं हैं |
किन्तु खेती और परिवार के स्वास्थ्य के लिए गोपालन तो आवश्यक है | इसलिए समझदार किसान अपने खेत-कुए पर ही झोपड़े बनाकर वहीं गोपालन करते हैं | खेत का रखवाला या घर का कोई सदस्य उनकी देखरेख करता है | लैकिन यह संख्या नगण्य है |
हिन्दू धर्म में अत्यन्त उपयोगी पेड़, वनस्पति, जीव-जन्तु को पूज्य स्थान पर रखा गया है | गाय उनमे से एक है | गाय केवल मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए ही नहीं तो पञ्च महाभूत (क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा) की रक्षा के लिए आवश्यक है | अनेक वैज्ञानिक कसौटियों पर यह कसा जा चुका है, इसे बार-बार सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं हैं | पृथ्वी पर गाय खत्म होने से अनेक संकट खड़े हो जायेंगे | यह धीरे-धीरे होने भी लगा है |
जैसे माँ के मर जाने से छोटे बच्चों की क्या स्थिति हो जाती है | वही स्थिति सम्पूर्ण जीव-जन्तुओं की हो जायेगी | इसलिए गाय को "विश्वस्य मातरः" कहा गया है |
भारत में विज्ञान को धर्म के माध्यम से ही बताया गया है | इसलिए गाय को धार्मिक मान्यता देकर उसमे सभी देवों का वास बताकर माता का दर्जा दिया गया | सदियों तक भारतीय समाज ने इसका पालन भी किया | अभी भी कोई सब कुछ खत्म नहीं हुआ है |
किन्तु जिस मात्रा में आवश्यक है उतना आज के परिवेश में गो का पालन, संवर्धन और संरक्षण एक चुनौती है | लगातार होते औद्योगीकरण, खत्म होते चरागाह, रासायनिक तथा मशीनीकृत खेती के कारण गाय के लिए सड़कों के अलावा कहीं जगह बची नहीं हैं | लैकिन मूल भारतीय समाज के मन में अभी भी गाय के लिए श्रद्धाभाव है | लैकिन वो विवश है | इसलिए पूरे देश की तरह गायें भी सरकारी तंत्र के भरोसे होकर दुर्दशा को प्राप्त हो गई |
गाय बचेगी तो सिर्फ किसान के खूंटे पर..| यह बात जब तक किसान को फिर से समझ न आ जाए तब तक गाय को गोशालाओं आदि में ही बचाना पढ़ेगा | सुधी जन गोशालाओं को समृद्ध करने की और ध्यान दें तथा समय-समय उसका निरीक्षण भी करें | बहुत जल्दी ही पुनः गोसेवा युग प्रारम्भ होगा | व्यर्थ के वाद-विवाद में न उलझते हुए बस इस थोड़े से संकट काल में गोमाता को बचा लें | यही प्रार्थना ..|
#गावो_रक्षति_रक्षितः 
बरसात का पानी धरती के अंदर जाता कैसे है ?
बाँध, तालाब आदि मानवनिर्मित तंत्र के अलावा एक तो ग्रीष्म काल में सूर्यताप से धरती के अंदर मिट्टी में नमी कम हो जाने से दरारें पड़ जाती है, जिससे वर्षा जल गिरते ही इन दरारों से धरती के अंदर समाने लगता है | तथा दूसरा महत्वपूर्ण कारण है धरती के अंदर पग-पग पर छोटे-बड़े छिद्र होते हैं जिन्हें पृथ्वी पर पाए जाने वाले जीव-जन्तु बनाते हैं | ये जीव अपना घर बनाने के लिए धरती के अंदर हजारों छेद करते हैं तथा वर्षाऋतु आने पर अपने घरों से अपने अंडे-बच्चे लेकर पेड़ों पर या ऊँचे स्थान पर चले जाते हैं |
इन अरबों-खरबों जीव-जन्तुओं को प्रतिदिन भोजन के लिए धरती के ऊपर ही आना पड़ता है , तथा हरबार नया छिद्र बनाकर निकलना पड़ता है | जिससे जमीन पोली हो जाती है तथा वर्षा जल वहीं से धरती के अंदर जाकर जमा हो जाता है, जिसको हम विभिन्न माध्यमों से खींचकर सालभर उपयोग करते हैं |
पिछले बीस वर्ष में मैंने अपने अनुभव से जाना है कि जमीन के अंदर रहने वाले इन छोटे-छोटे असंख्य जीवों के लिए गाय का गोबर सबसे सबसे अच्छा खाद्य है | गाय का गोबर जहाँ गिरता है, वहाँ जमीन से अनेक प्रकार के जीव निकलकर उसे एक-दो दिन में ही चट कर जाते हैं | गाय के गोबर में केंचुओं की संख्या बढ़ाने की अद्भुत क्षमता है और केंचुआ धरती को उपजाऊ बनाने सबसे बड़ा माध्यम है | केंचुआ मिट्टी के अंदर पड़े अपशिष्ट खाता है तथा मलत्याग धरती के ऊपर आकर करता है | जिससे धरती पोली और भुरभुरी बनती है, ऐसी मिट्टी में फसलों की जड़ें गहरी जाती है | तथा धरती में जलधारण करने की क्षमता भी बढ़ती है |
इसलिए कहा गया है जहाँ गाय कम हो जायेगी वहाँ जमीन की उर्वरकता कम होती जायेगी तथा धरती के अंदर का भी जल सूखता जायेगा | जैवविविधता की रक्षा करने में गाय सक्षम हैं , हमें केवल गाय की रक्षा करनी है |

कृषि नीति

#कृषि_नीति 
अंग्रेजों के आने के पूर्व भूमि का बंदोबस्त गाँव के लोग ही करते थे | भूमि किसी की नहीं अपितु गाँव की होती थी | एक से दूसरे गाँव के बीच काकड़ अथवा मेढा हुआ करता था | गाँव के लोग मिल बैठकर कृषि, चरागाह तथा वन क्षेत्र की भूमि का स्थान तय करते थे | प्रति दस वर्ष में चरागाह और कृषि भूमि की अदला-बदली होती थी | पड़त भूमि पर गोबर और गोमूत्र गिरने से वह फिर से उपजाऊ जाती थी | अंग्रेज लोग चाहे भूमि का बँटवारा कर गए किन्तु पड़त और कृषि भूमि का यह परिवर्तन आजादी के बाद भी होता रहा |
लैकिन पिछले तीस-चालीस वर्षों में यह बदलाव न के बराबर हुआ है | चरागाह लगभग समाप्त हो गए और कृषि योग्य भूमि पर लगातार खेती वो भी एक ही प्रकार की हो रही है | ऊपर से रसायन और कीटनाशकों ने भूमि का जो सत्यानाश किया है वो अलग ..| 
अगर हमें अपनी धरती पुनः सुजलाम् सुफलाम् बनाना है तो किसी भी रूप में उसमे गोबर और गोमूत्र का प्रयोग करना ही होगा |

भुजरिया विज्ञान

#भुजरिया_का_विज्ञान 
आजकल तो अन्न के बीज को सुरक्षित रखने तथा उसके परीक्षण के अनेक तरीके विकसित हो गए हैं | किन्तु प्राचीन काल से भारत में अगले एक वर्ष तक बीज को सुरक्षित रखने के भी तरीके थे | पहले घरों में भिन्न-भिन्न प्रकार की मिट्टी की कोठियाँ बनती थी, जिसमे नीम आदि की पत्तियाँ मिलाकर उसे वायुरोधक बनाकर अलग-अलग कोठियों में बीज रखा जाता था | 
इसके साथ ही उस सुरक्षित बीज का समय-समय पर परीक्षण भी किया जाता था |
#पहला 
- चैत्र मास में जब बीज रखा जाता था तो अच्छा बीज किस खेत का है, उसी खेत की मिट्टी लाकर उसे घर में #चैत्र_नवरात्रि में देवस्थान पर लाकर उगाया जाता था | जिसे हम जुआरे कहते हैं | जिस खेत का अन्न अच्छा उगता था, उसमें से बीज के लिए तिगुना रख लिया जाता था | शेष अन्न वर्षभर खाने के लिए रख लिया जाता था, ज्यादा होने पर बेच दिया जाता था |
#दूसरा
- बीज का दूसरा परीक्षण सावन मास में किया जाता था, कोठियों से अन्न निकालकर कि कहीं बीज में घुन तो नहीं लगा, उसे सावन शुक्ल नवमी को खेत से महुए के पत्तों और बाँस की टोकरी में मिट्टी लाकर पुनः बोया जाता था | इसे भुजलिया/कजलिया के नाम से जाना जाता है | भाद्र कृष्ण प्रतिपदा (आज के दिन) को इन भुजलियों की शोभायात्रा धूमधाम से निकाली जाती थी | हर किसान एक-दूसरे का बीज कैसा उगा यह देख भी ले इसलिए नदी-सरोवर आदि में जुआरे धोकर उसे एक-दूसरे को भेंट दिया जाता था | लोग इसी समय बीज की अदला-बदली भी कर लेते थे |
#तीसरा
- तीसरा परीक्षण बुआई के ठीक पहले #शारदीय_नवरात्रि में देवी जी के यहाँ सार्वजनिक रूप से जुआरा लगाने की परम्परा सदियों से है | पुनः जिस खेत में बुआई करना है उसकी मिट्टी लाकर मिट्टी के पात्र में अन्न उगाया जाता है | जिस कोठी का सबसे अच्छा उगता उसे बीज के लिए तथा बाकी को अगले चार माह भोजन के रूप में उपयोग हो जाता था |
- आज सिद्ध हुआ है कि जुआरे केंसर रोधी है | हमारे यहाँ तो सदियों से जुआरे का रस पीने की परम्परा है | नदियों-सरोवरों में जुआरे धोने के बाद उसमें से आधे जुआरे गाँव के मन्दिर में चढ़ा दिया जाता था, मन्दिर का पुजारी उसे बाँटकर रस निकालकर शाम को संध्या आरती में भगवान के चरणामृत के रूप में सबको बाँटता था |
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बीज बचाने की इस अद्भुत प्रयोगशाला को हमारे पूर्वजों ने धर्म के साथ जोड़कर उसे त्यौहार का रूप दे दिया | जिसे हम आज भी धूमधाम से मनाते आ रहे हैं | भुजलिया के इस पर्व को कुछ विद्वान भू-जल के संरक्षण से भी जोड़कर देखते हैं |
सभी मित्रों-शुभचिन्तकों को हरियाली विस्तार के शुभ पर्व #भुजलिया की हार्दिक बधाईयाँ-शुभकामनाएँ |
#साहित्य_अकादमी_पुरूस्कार 
मेरे साहित्यिक जीवन का आज सबसे बड़ा दिन है | मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी भोपाल के निदेशक डॉ. Umesh Singh जी द्वारा आज दिनांक १९/०८/२०१६ को घोषित २०१४ के साहित्य अकादमी पुरुस्कारों में मेरी प्रथम कृति "#चातुर्मास" को #दुष्यन्त_कुमार_पुरूस्कारसे अलंकृत किया गया है | श्रेष्ठ साहित्यकारों का आशीर्वाद और आप मित्रों की शुभकामनाओं का ही यह प्रतिफल है | 
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किसी नवोदित रचनाकार के लिए साहित्य अकादमी का पुरूस्कार अमृत फल के समान है, जिसे पाकर वह न केवल धन्यता को प्राप्त होता है अपितु अपनी शक्ति और उत्साह को द्विगुणित कर अपने लक्ष्य प्राप्ति की ओर तेजी से कदम बढ़ाता है |
आभार साहित्य अकादमी भोपाल / धन्यवाद पुनः सभी मित्रों का |

साहित्य अकादमी पुरूस्कार

#साहित्य_अकादमी_पुरूस्कार 
मेरे साहित्यिक जीवन का आज सबसे बड़ा दिन है | मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी भोपाल के निदेशक डॉ. Umesh Singh जी द्वारा आज दिनांक १९/०८/२०१६ को घोषित २०१४ के साहित्य अकादमी पुरुस्कारों में मेरी प्रथम कृति "#चातुर्मास" को #दुष्यन्त_कुमार_पुरूस्कारसे अलंकृत किया गया है | श्रेष्ठ साहित्यकारों का आशीर्वाद और आप मित्रों की शुभकामनाओं का ही यह प्रतिफल है | 
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किसी नवोदित रचनाकार के लिए साहित्य अकादमी का पुरूस्कार अमृत फल के समान है, जिसे पाकर वह न केवल धन्यता को प्राप्त होता है अपितु अपनी शक्ति और उत्साह को द्विगुणित कर अपने लक्ष्य प्राप्ति की ओर तेजी से कदम बढ़ाता है |
आभार साहित्य अकादमी भोपाल / धन्यवाद पुनः सभी मित्रों का |