Saturday, 23 September 2017

प्राचीन मौसम विज्ञान

#घाघ_भड्डरी की कहावतों को परखें | कल श्रावण शुक्ल सप्तमी हैं | अपने-अपने स्थान का मौसम जांचें |

'श्रावण शुक्ला सप्तमी, डूब के उगे भान,
तब ले देव बरिसिहैं, जब सो देव उठान।'
-सावन शुक्ल सप्तमी को यदि सूर्य बदली में डूब कर उगे तो कार्तिक माह में देवोत्थान एकादशी तक अवश्य वर्षा होती है।
'श्रावण शुक्ला सप्तमी, उगत दिखे जो भान,
या जल मिलिहैं कूप में, या गंगा स्नान।'
-यानि सावन माह की शुक्ल पक्ष की सप्तमी को प्रात: सूर्य का उगना दिखे तो घाघ के अनुसार निश्चित रूप से सूखा पड़ेगा।
सावन सुक्ला सत्तमी, जो गरजे अधिरात।
तू पिय जाओ मालवा, हम जायें गुजरात।।
-यदि श्रावण शुक्ल सप्तमी को अर्धरात्रि में बादल गरजें, तो हे प्रिय तुम मालवा चले जाना और मैं गुजरात चली जाऊँगी अर्थात् अकाल पड़ने वाला है |
सावन सुक्ला सत्तमी, गगन स्वच्छ जो होय।
कहै घाघ सुन भड्डरी, पुहुमी खेती खोय।।
- सावन महीने के शुक्ल पक्ष की सप्तमी को यदि आसमान साफ हो तो घाघ कहतें हैं कि हे भड्डरी! यह जान लो कि अकाल पड़ने वाला है और खेती नष्ट हो जायेगी।
सावन मास बहै पुरवाई।
बरधा बेंचि बेसाहो गाई।।
- जब श्रावण मास में पुरवाई चले तो कृषक को चाहिए कि वह अपने बैलों को बेचकर गाय खरीद ले क्योंकि सूखा पड़ने के आसार हैं जिसमें खेती नहीं हो सकेगी।
सावन सूखा स्यारी।
भादौं सूखा उन्हारी।
स्यार-खरीफ। उन्हारी-रबी की फसल।
- यदि सावन मास में वर्षा न हुई तो खरीफ की फसल को अत्यधिक नुकसान होता है इसी प्रकार यदि भादों में वर्षा न हुई तो रबी की फसल नष्ट हो जाती है।

Friday, 7 April 2017

#अखण्ड_भारत_का_केन्द्र_बिन्दु 
बात १९९२-९३ की है | आमला ( भारतीय वायुसेना का शस्त्रागार) में १४ अगस्त को अखण्ड भारत स्मृति दिवस का आयोजन था | जिसमें प्रोफ़ेसर सदानन्द सप्रे जी का भाषण होना था | हमने आमला नगर में खूब प्रचार किया | सेना के सेवानिवृत्त अधिकारी भी काफी संख्या में कार्यक्रम में आये | शेष बड़ी संख्या में वायुसेना के अधिकारियों ने दूर खड़े होकर सप्रे जी का अखण्ड भारत विषय पर प्रेरक उद्बोधन सुना | कार्यक्रम के बाद सेना के अधिकारियों ने बताया कि आप जिस अखण्ड भारत की बात करते हैं उस अखण्ड भारत का केन्द्र बिन्दु तो यहीं पास में बरसाली नामक गाँव में हैं | हमारी उत्सुकता जगी | मैं कुछ युवा साथियों को लेकर बरसाली गया, सतपुड़ा की सुरम्य और उत्तुंग पर्वत श्रंखलाओं के मध्य बैतूल से १४ किलोमीटर दूर ग्राम बरसाली यूँ तो बैतूल जिले का एक बहुत सामान्य सा गाँव है, जहाँ लोग खेती और पशुपालन द्वारा अपना जीवन निर्वाह करते हैं | गन्ने की खेती के लिए भी यह क्षेत्र प्रसिद्ध है | कभी यह क्षेत्र खेड़ला किला (बरसाली से दस किलोमीटर दूर) के गौरवमयी इतिहास के साथ जुड़ा, जहाँ सैंकडों वर्षों तक गौंड राजाओं का राज्य रहा | अजंता-एलोरा की गुफाएं बनाने वाले "राजा इल" के समृद्धशाली राज्य का भी यह हिस्सा रहा | खेड़ला किला पर मराठी का आद्द्य ग्रन्थ "विवेक सिंधु" की रचना महाकवि संत मुकुन्द स्वामी जी ने की | 
 खैर ..लोगों से चर्चा करने पर ध्यान आया कि गाँव के लोग उस स्थान को एक देव स्थान के रूप में मानते हैं | अखण्ड भारत के केन्द्र बिन्दु होने की बात पहली बार हमने उनको बताई | जब केन्द्र बिन्दु स्थान पर पहुँचे तो वहाँ एक बड़ा सा पत्थर पहाड़ी के नीचे पड़ा था, जिस पर अस्पष्ट कुछ लिखा हुआ है | गाँव के लोग इस पत्थर को सैंकडों वर्ष पुराना मानते हैं तथा पीढ़ी दर पीढ़ी देखते आ रहे हैं | मान्यताओं के अनुसार यही वह पत्थर है जो राजा टोडरमल (राजा टोडरमल ने विश्व की प्रथम भूमि लेखा-जोखा एवं मापन प्रणाली तैयार की थी) ने लगभग ५०० वर्ष पूर्व अखण्ड भारत के केन्द्र बिन्दु के रूप में यहाँ स्थापित किया था | ग्राम बरसाली जम्मू से कन्याकुमारी रेलमार्ग पर मध्य रेलवे के इटारसी - नागपुर रेल खण्ड पर स्टेशन के पास स्थित है। यहाँ पेसेंजर गाडियां रुकती है |
इस बीच कई बार केन्द्र बिन्दु पर जाना हुआ | बैतूल के सुधी नागरिकों ने उस पत्थर को स्थापित करवाया | 
८ फरवरी २०१७ को बैतूल में सम्पन्न ऐतिहासिक हिन्दू सम्मेलन के मुख्य अतिथि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के परम पूज्य सरसंघचालक मोहनराव जी भागवत ने भी बैतूल का उल्लेख अखण्ड भारत के केन्द्र बिन्दु के रूप में किया | तब से पुनः उस स्थान पर जाने की इच्छा थी | आज श्री सुरेन्द्र जी सोलंकी, श्री बुधपाल सिंह जी और श्री Anand Prajapati जी के साथ बरसाली जाना हुआ | ग्राम सरपंच श्री पुरुषोत्तम यादव जी के साथ ग्रामीणों से विस्तृत चर्चा हुई | ग्राम बुजुर्गों ने बताया कि यह लगभग दस फिट की शिला थी जिसमे से आधी शिला कई वर्ष पूर्व ग्राम मोरनढाना के कोई केशव पटेल जी ले गए , जिसकी उन्होंने श्री हनुमान जी की प्रतिमा बनाकर गाँव में स्थापित की |
सरपंच महोदय ने बताया कि यहाँ वायुसेना के बहुत से अधिकारी आते रहते हैं | गाँव के लोग वार-त्यौहार पर शिला के सम्मुख दीप जलाते हैं | वहाँ तक पहुँचने का मार्ग दुर्गम है | इस स्थान की एक ओर विशेषता है कि यहाँ की मुख्य पहाड़ी पश्चिम छोर का पानी माचना नदी से तवा होते हुए नर्मदा मैया के द्वारा सिंधु (अरब) सागर में जाता है तथा पूर्व दिशा का पानी बेल नदी के द्वारा कान्हान होते हुए वर्धा नदी से वेनगंगा होते हुए माँ गोदावरी के द्वारा गंगा सागर (बंगाल की खाड़ी) में मिलती है |
गाँव वालों की इच्छा है कि यहाँ पर्यटक स्थल बनें और हमारा गाँव पुनः दुनियाँ के नक़्शे में दिखने लगे | 
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कुछ भी हो...बैतूल है बहुत अद्भुत...अखण्ड भारत बनाने का एक सूत्र भी यहाँ विद्यमान है |
#भारत_माता_की_जय

Thursday, 23 February 2017

|| #सोनाघाटी की पहाड़ी और #सतपुड़ा_के_घने_जंगल ||

|| #सोनाघाटी की पहाड़ी और #सतपुड़ा_के_घने_जंगल ||
देवाधिदेव महादेव की कृपा से महाशिवरात्रि के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर सोनाघाटी शिव मन्दिर के दर्शन करने का सिलसिला जो १९९२ से प्रारम्भ हुआ आज तक जारी है | सोनाघाटी बैतूल की वह पहाड़ी है जिसने बैतूल के पर्यावरण को अब तक सम बनाकर रखा था | पिछले दस-पन्द्रह वर्षों में इस पहाड़ी को छिन्न-भिन्न करने का जो पाप किया जा रहा है, उसके दुष्परिणाम भी सामने आ रहे है | फोरलेन ने तो इस पहाड़ी का कबाड़ा ही कर दिया | कभी मार्च अन्त तक घरों में पंखे बन्द रखने वाला बैतूल अब फरवरी में ही तपने लगा है | कभी वर्ष भर सुन्दर बहने वाली सोनाघाटी पहाड़ी से निकली नदी अब गंदे नाले में बदल गई है |
सोनाघाटी की श्रंखलाबद्ध पहाड़ी को पहली बार १८९३-९४ में काटा गया था जब इटारसी-नागपुर रेलवे लाईन बिछाई गई थी | लैकिन तब जंगल घना होने तथा पहाड़ी को तिरछा काटने से बैतूल नगर के तापमान में कोई विशेष अंतर नहीं आया होगा | उसी समय यह पहाड़ी दो भागों में विभाजित हुई और कभी एक ही पहाड़ी पर बने शिव और हनुमान मन्दिर पृथक हो गए |
परन्तु जंगल तब भी बहुत घना रहा होगा, यह इस बात से सिद्ध होता है कि प्रकृति के चितेरे कवि दादा #भवानीप्रसाद_मिश्र ने सोनाघाटी की इसी पहाड़ी पर बैठकर १९३९ में अपनी कालजयी रचना “सतपुड़ा के घने जंगल, ऊँघते अनमने जंगल” लिखी थी | बैतूल और दादा भवानी प्रसाद मिश्र जी के जानने वालों का मानना है कि यह रचना दादा ने हनुमान मन्दिर की पहाड़ी पर बैठकर लिखी थी | तब से हर वर्ष मैं भगवान शिव और बजरंग बली के साथ उस शिला को भी नमन करके आता हूँ |
अभी दो वर्ष पूर्व मिश्र जी के जन्मशताब्दी वर्ष में हमारे विद्यालय भारत भारती ने इस कालजयी रचना को सोनाघाटी से महज डेढ़ किलोमीटर दूर अपने विद्यालय परिसर में पत्थर पर खुदवाकर धरोहर बनाया है और मिश्र जी का जो जंगल अब बीस किलोमीटर दूर चला गया उसकी भरपाई के लिए पौधरोपण और संरक्षण का कार्य भी भारत भारती के द्वारा हो रहा है |
जब इस कविता को पत्थर पर खुदवाने की जानकारी भवानीप्रसाद मिश्र जी के बेटे व प्रसिद्ध पर्यावरणविद #अनुपम_मिश्र जी (दिल्ली) को मिली तो उन्होंने मुझे फोन कर खूब प्रशंसा की तथा एक बार भारत भारती आकर शिलालेख को देखने की तीव्र इच्छा प्रकट की थी | किन्तु शायद ईश्वर को यह स्वीकार नहीं था अनुपम जी यह शिलालेख देखे बिना ही इस नश्वर संसार से विदा हो गए |
हम बैतूलवासियों को प्रकृति के चितेरे और रक्षक पिता-पुत्र (दादा भवानी प्रसाद और अनुपम मिश्र जी) को अगर सच्ची श्रद्धांजलि देना है तो सम्पूर्ण सोनाघाटी की पहाड़ियों को न केवल बचाना पड़ेगा अपितु उसे हरियाली साड़ी पहनाकर श्रंगार कर रहे Arun Singh Bhadoriya जी जैसे प्रकृति पुजारियाँ का सहयोग भी करना होगा | पहाड़ों को बचाने के लिए ही हमारे पूर्वजों ने वहाँ देवालय स्थापित किये हैं | यह पूज्य भाव भी समाज का बना रहे, देवताओं के साथ पहाड़ और पेड़ भी पुजते रहे | यही आज का शिव संकल्प है | इति | -मोहन नागर
(आज प्रातः सोनाघाटी से लिए कुछ चित्र)
#महाशिवरात्रि की सभी मित्रों-शुभचिन्तकों को बधाईयाँ-शुभकामनाएँ |

Tuesday, 6 September 2016

गुजरात प्रवास

#गुजरात_प्रवास (भाग-१)
सड़क मार्ग से गुजरात प्रवास पर जाते समय रास्ते में सरस्वती विद्या प्रतिष्ठान के वाहन चालक श्री सुखदेव सिसोदिया का गाँव जामन्या (निवाली-बड़वानी) पड़ता है | सुखदेव भाई का आग्रह था कि दोपहर का भोजन घर पर करेंगे | हम दो गाड़ियों में Niranjan Sharma जी, बुधपाल सिंह जी, Gopal Soni जी,Roopsingh Lohane जी तथा हुकुमचंद भुवंता जी सहित आठ लोग थे | जैसे जी बारह बजे के लगभग सुखदेव भाई के घर पहुँचे तो वहाँ तीस-पैंतीस महिला-पुरुष मिलकर दाल-पानिया (मक्का की बाटी-उड़द की दाल) बना रहे थे |
मैंने सुखदेव भैया से कहा "क्यों भाई पूरा गाँव इकठ्ठा हो गया" |
सुखदेव ने कहा "नहीं भाईसाहब, ये सब मेरे एक ही परिवार के लोग है" |
हम सब को सुखद आश्चर्य हुआ कि गाँवों में आज भी सयुंक्त परिवार इतनी बड़ी संख्या में रहता है | ये सब सुखदेव भाई के पिताजी श्रद्देय गारदिया जी के स्नेह व समन्वय का ही प्रताप है | चर्चा करने पर उन्होंने बताया कि वे चार भाई में से अकेले बचे हैं | सभी भाईयों के बाल बच्चों की जवाबदारी उन्होंने ही निभाई है | उनका कुटुम्भ तो गाँव में चार सौ से अधिक संख्या का है | पर एक ही छत के नीचे चालीस से अधिक उनके तथा भाईयों के बच्चे, नाती-पोते रहते हैं |
घर पर अच्छी खेती है, सभी उन्नत खेती करते हैं | गाय-भैंस है, भोजन गोबर गैस पर बनता है | परिवार के कुछ सदस्य बाहर भी नौकरी करते हैं, लैकिन वार-त्यौहार पर सब इकठ्ठे हो जाते हैं |
भारत के सरल सहज जनजाति समाज ने न केवल प्राकृतिक सम्पदा को बचाकर रखा अपितु भारत की सांस्कृतिक विरासत और जीवन मूल्यों को भी संजोकर रखा है | दाल-पानिए का पेट भर रसास्वादन कर व पूरे परिवार को यथायोग्य प्रणाम कर हम अगले पड़ाव की ओर चल दिए |

#गुजरात_प्रवास (भाग-२)
गुजरात के भरूच जिले की मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र से लगी सीमा जनजाति बहुल है | ईसाई मिशनरियाँ देश के हर प्रान्त के सीमावर्ती क्षेत्रों में ही सेवा की आड़ में मतान्तरण का जाल बुनती है | भरूच की नेत्रंग तहसील के गाँव-गाँव में मिशनरियों की गतिविधियाँ चलती हैं | अनेक गाँवों में मतान्तरण भी हुआ है | 
गुजरात विद्या भारती द्वारा जब जनजाति क्षेत्र में कार्य विस्तार की बात आई तो सबका ध्यान इस क्षेत्र की ओर आया | तब २००६-०७ में "माधव विद्या पीठ" नामक एक शैक्षिक संस्थान की स्थापना नेत्रंग के पास काकड़कुई गाँव में हुई | गुजरात के जनजाति शिक्षा के अब प्रान्त प्रमुख श्री विजय भाई सुरतिया (Vijaysinh Suratia) ने तब चार वर्ष का अपना पूरा समय देकर उस बंजर जमीन को हरी-भरी करने तथा संस्थान को प्रतिष्ठा दिलाने के लिए कार्यकर्ताओं के साथ दिन-रात एक कर दिया |
तब जहाँ पीने का पानी डेढ़ किलोमीटर दूर से लाना पड़ता था | आज वहाँ आम, नीम, गुलमोहर, चन्दन सहित बीसीयों प्रजाति के वृक्ष फलफूल रहे हैं | ३०० से अधिक वसावा जनजाति के भैया-बहिन आवासीय विद्यालय में रहकर यहाँ नि:शुल्क अध्ययन कर रहे हैं | बच्चों का अनुशासन, सरलता, परिश्रम देखने लायक है | तीस से अधिक गिर गायों की सुन्दर गोशाला है | आसपास के गाँवों में शिक्षा के अनेक केन्द्र प्रारम्भ हुए हैं | अच्छे परीक्षा परिणाम और सुसंस्कारों के कारण अब लोग मिशनरियों के स्कूलों से बच्चों को निकालकर माधव विद्यापीठ में भर्ती कराने लगे हैं |
विद्या भारती की ग्रामीण और जनजाति शिक्षा में शिशु शिक्षा के पाठ्यक्रम पर यहीं शिशु वाटिका की अखिल भारतीय प्रमुख आशा बेन थानकी के मार्गदर्शन में सर्वश्री निरंजन जी, भुवंता जी, बुधपाल जी, गोपाल जी, रूपसिंह जी के साथ तीन दिन चिन्तन हुआ | इस हेतु आसपास के गाँवों में जाकर स्थानीय समाज से वार्तालाप भी हुआ | गुजराती, मालवी और निमाड़ी तीनों भाषाएँ सगी बहिनों की तरह होने से सबसे बातें करने में बहुत आसानी हुई | जहाँ जाओ वहाँ अपनी आदत अनुसार मैंने गौ आधारित कृषि के कुछ गुर भी बच्चों, आचार्यों व अभिभावकों को सिखाये |

#गुजरात_प्रवास (भाग-३)
नेत्रंग (भरूच) के आसपास के कुछ गाँवों में घूमने पर कहीं-कहीं पृथक "भीलीस्तान" बनाने के स्वर सुनाई दिए | कम ही लोग जानते हैं कि गुजरात के साबरकांठा, बनासकांठा, पंचमहल, दाहोद, नर्मदा, भरूच, तापी, डांग, सूरत, नवसारी, वलसाड और इससे जुड़े हुए राजस्थान के बाड़मेर, जालौर, सिरोही, उदयपुर, बांसवाड़ा और मध्यप्रदेश के रतलाम, झाबुआ, अलीराजपुर, बडवानी, धार, महाराष्ट्र के नंदुरबार, धुले, नासिक आदि जिलों को मिलाकर एक नया राज्य की चर्चा अनेक वर्षों से है|
जागरूक ग्रामीणों से चर्चा करने पर ध्यान में आया कि इस क्षेत्र में आन्दोलन को अंदर से खाद-पानी देने का काम मिशनरियाँ और अपने बिहार वाले इशरत के अब्बू का दल भी वहाँ लोगों को यूनाइटेड कर रहा है | एक समय जनता दल गुजरात में प्रभावशाली राजनीतिक दल था, अब उसके कुछ अवशेष भरूच जिले में ही बचे हैं | लोगों ने बताया कि यहाँ भी चर्च और#लाल_गुलाम एक ही थेली के चट्टे-बट्टे हैं |

एक गाँव के किनारे पहाड़ी पर बनी कब्र पर क्रास लगा देखकर मैंने स्थानीय ग्रामीणों से पूछा तो उन्होंने बताया कि जनजाति समाज के किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाने पर उस क्षेत्र का पादरी मुर्दाखोर की तरह सूँघते हुए उस गाँव में पहुँच जाता है और मृतक के परिवार पर दबाव बनाकर कि मृतक कभी चर्च में आता था, यह हवाला देकर उसे दफनाने पर विवश करता है तथा उसकी कब्र पर क्रास लगवाता है | जबकि यहाँ के जनजाति समाज में अब अन्तिम क्रिया दाह संस्कार के द्वारा होने लगी है |
कुल मिलाकर समाज विघातक शक्तियाँ हमारे समाज को तोड़ने का षड्यंत्र देश के हर कोने-कुचारे में वर्षों से अबाध गति से चला रही थी | संघ और उससे प्रेरित संगठन उसे रोकने में अथवा अनेक स्थानों पर उनकी असलियत समाज को बताने में समर्थ हुए हैं | "वे" इसीलिये तो#संघ_मुक्त भारत चाहते हैं |
#गुजरात_प्रवास (भाग-४)
वापसी में सबकी इच्छा "स्टैच्यू आफ यूनिटी" स्थल देखने की हुई | यह स्थान भरूच के पास नर्मदा जिले में सरदार सरोवर बाँध से सवा तीन किलोमीटर की दूरी पर साधु बेट नामक स्थान पर नर्मदा जी के बीचोंबीच एक टापू पर है | यहीं पर लोहपुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल का दुनियाँ में सबसे ऊँचा (१८२ मीटर) स्मारक बनने वाला है | इस विशालकाय भव्य मूर्ति का शिलान्यास २०१३ में नरेन्द्र भाई जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे, तब कर चुके हैं | 
एक तरफ विन्ध्याचल तथा दूसरी ओर सतपुड़ा पर्वत है | माँ नर्मदा के एकदम मध्य में यह स्मारक बन रहा है | जब हम वहाँ पहुँचे तो स्मारक स्थल तक अभी जाने की अनुमति नहीं होने से किनारे से ही निर्माणाधीन स्मारक को देखा | आधार का काम लगभग पूर्णता की ओर है | वहाँ के एक अधिकारी से चर्चा करने पर उन्होंने बताया कि इस स्मारक के आगे एक बाँध ओर प्रस्तावित है, जहाँ पण बिजली से निकलने वाले जल को संग्रहित कर उसे पुनः सरदार सरोवर में लिफ्ट किया जायेगा | तब यह स्मारक पूर्ण रूप से जल के मध्य में होगा |
सरदार सरोवर के सामने लगी लोहपुरुष की प्राचीन प्रतिमा को प्रणाम कर विशालकाय पण बिजली घर को देखकर वहाँ से निकली नदियों के समान नहरों के किनारे-किनारे आगे बढ़ते हुए हम मध्यप्रदेश के अलीराजपुर नगर होते हुए निरंजन जी के गाँव झापड़ी में उनके खेत में खटिया पर यात्रा की थकान दूर कर घर में गरमागरम पराठे खाकर अपने-अपने गंतव्य की ओर प्रस्थान कर गए |
|| इति ||
#माँ 
- माँ सुबह चार बजे से उठकर घट्टी (चक्की) में ज्वार पीसते हुए गीत गाती थी, वो आवाज सौ लता मंगेशकर से भी मीठी होती थी |
- माँ सुबह साढ़े चार बजे राई घुमाकर दहीं से मक्खन अलग कर जो छाछ बनाती थी, दुनियाँ का कोई पेय आज भी उसके मुकाबले का नहीं है |
- माँ सुबह पाँच बजे गाँव की कुण्डी (छोटा कुआ) से रस्सी से खींचकर मटके में पानी भरकर लाती थी, वो स्वाद दुनियाँ का कोई आरो वाटर नहीं दे सकता |
- मेरी बिना पढ़ी-लिखी माँ रोज सुबह खटिया के पास चिमनी जलाकर तथा स्कूल का झोला सिरहाने रखकर कहती "उठ , भण बेटा" | दुनियाँ का कोई शिक्षक यह नहीं कर सका |
- स्कूल का समय होते ही माँ काला टीका लगाकर झोला कंधे में टांगकर भेज देती, हम हमेशा मास्टर जी से पहले स्कूल पहुँच जाते | तब कोई घड़ी नाम की चीज घर पर नहीं थी |
- संवेदना की पराकाष्ठा तो तब हो जाती, जब भूख लगने को होती ही थी कि माँ आवाज लगा देती "जीम ले बेटा", |
- जब भी आइसक्रीम वाला गाँव में आता था , मैं दुनियाँ के सबसे अमीर घर का बच्चा होता था, क्योंकि माँ के पल्लू में पंजी-दस्सी रहती ही थी |
- मैं जब खेत पर जाता तो माँ खेत पर मिलती, जब घर पर आता था तो माँ घर पर मिलती | मैं खेलते हुए गाँव की किसी भी गली में गिर जाता, माँ तुरन्त आकर उठा लेती थी, ब्रहमाण्ड के किसी धर्म का भगवान इतना अंतरयामी नहीं हो सकता |
- अभी भी जब कभी घर पर माँ से मिलकर जिस स्थान के लिए निकलता हूँ, पहुँचने के दस-पाँच मिनिट आगे पीछे छोटे का फोन आ जाता है कि माँ पूछ रही "पहुँच गए क्या" ...|
#प्रकृति 
बादल 
अक्सर रास्ता भटक जाते हैं,
क्योंकि वे 
सड़क-सड़क नहीं 
पेड़-पेड़ चलकर आते हैं |
#ओटला (काव्य संग्रह)
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बचपन में गाँव के घर के बाहर का “ओटला” (घर की बाहरी दीवार से सटा चबूतरा) ही अपना संसार था | उसी “ओटले” पर खेले कूदे बड़े हुए | हर सप्ताह घर के ओसारी-आँगन की लिपाई के साथ ओटला भी गोबर से लीपकर माँ उस पर पाण्डू (सफ़ेद रंग की मिट्टी) से एक बड़ा “मांडना” बनाती थी | जाड़े में सूरज सबसे पहले ओटले पर ही आता था और चौमासा शुरू होने के पहले दादाजी उसी ओटले पर बबूल और पलास की लकड़ी और पूस से बने टट्टे डाल देते थे, एक बूँद पानी नहीं आता था | दादाजी, पिताजी और काका लोग तथा आसपड़ोस के बड़े-बूढ़े सावन-भादौ की झड़ियों में ओटले पर ही इकठ्ठे होकर पलास की जड़ और सन से गाय-बैल तथा अन्य पशुओं के लिए रस्सियाँ और उनके मोरे, जोत, रास, सुंडे तथा कुए-बावड़ी से पानी खींचने वाली पतली-मोटी रस्सियाँ बनाते थे |
यह सब करते हुए मौसम की कहावतें, अच्छी बैल जोड़ियां, गाँव के नदी-तालाब के किस्से तथा पूरे परगने के नात-भांत पर चर्चाएँ होती रहती थी | हम बच्चे भी मटके से निकालकर अम्मा द्वारा दिए हुए होले (सिके हुए चने) चबाते हुए कुतुहल से उनकी बातें सुनते रहते | कभी बाल भारती पढ़ते तो कभी रस्सी बनाना सीखते |
समय का पहिया बड़ी तेजी से घूमा | गाँव, क़स्बा, नगर, महानगर घूमते हुए चार-पाँच दशक बीत गए, लैकिन मन में ग्राम्य जीवन ही बसा रहा | जहाँ भी रहा गाँवों से जीवन्त सम्पर्क बना रहा |
लैकिन बचपन वाला गाँव कहीं खो गया | घर के सामने बना ओटला अब कमरे में बदल गया | पहले गाँव में नमक, जर्दा-सुपारी तथा कुछ कपड़े ही शहर से आते थे | बाकी जरूरतों की सारी चीजें छोटे से गाँव में ही बनती थी | मतलब हर गाँव एक बिग बाजार या मॉल था | अब तो गाँव में हर चीज के लिए शहर दौड़ना पड़ता है | समझ नहीं आता हम तब पिछड़े थे या अब..| मेरे बचपन के सामने कभी अपने गाँव में पानी की समस्या नहीं आई क्योंकि गाँव के बड़े तालाब में सालभर पानी रहता था और उसी की बाजू से निकली छोटी नदी की रेत में झिरी खोदकर हम जेठ में भी पानी पी लेते थे | लैकिन अब तालाब भी सिकुड़ गया, नदी तो चैत में ही मर जाती है | उस जमाने के सार्वजनिक जामुन, आम, खजूर सब खतम हो गए | नए किसी ने लगाए नहीं, अगर है तो वे हाइब्रिड बाग-बगीचे किसी के निजी है | अब नई पीढ़ी में पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ी है | शासन और समाज मिलजुलकर इस ओर एक कदम आगे बढ़ाया है | लैकिन आज बहुत बड़े आन्दोलन की आवश्यकता है | पर्यावरण के राक्षसों से पंचतत्वों की रक्षा एक बड़ी चुनोती है |
उसी से उपजी कुछ पीड़ायें इस “ओटला” काव्य संग्रह में है | मालवा, राजस्थान को छोड़कर "ओटला" हिन्दी के अन्य पाठकों के लिए नया शब्द होगा | “चातुर्मास” के बाद यह मेरा दूसरा काव्य संग्रह है | हरि इच्छा, कब तक यह संग्रह पुस्तक के आकार में जन्म लेता है | इसी में हर दिन एकाध घंटा पिछले एक माह व्यस्त था | इसीलिये फेसबुक के मित्रों से लम्बे समय बाद प्रत्यक्ष भेंट हो रही है | सभी को राम-राम |